क्यों SC/ST आरक्षण में नहीं हो सकता 'क्रीमी लेयर'? SC से बोली सरकार- आप इससे दूर रहिए

हिन्दुस्तान टाइम्स, दनीता यादव | नई दिल्ली
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि SC/ST आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' लागू नहीं हो सकती। सरकार ने कहा कि यह व्यवस्था सिर्फ OBC के लिए है और इसका आधार आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक है।

SC/ST रिजर्वेशन में क्रीमी लेयर लागू करने से केंद्र का इनकार, सुप्रीम कोर्ट में दी यह दलील
SC/ST रिजर्वेशन में क्रीमी लेयर लागू करने से केंद्र का इनकार, सुप्रीम कोर्ट में दी यह दलील

केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट कर दिया कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि क्रीमी लेयर की व्यवस्था अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) पर ही लागू की गई है। सरकार के मुताबिक, आरक्षण की नीति सिर्फ आर्थिक स्थिति पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसका मुख्य आधार ऐतिहासिक और सामाजिक है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दिए ये अहम तर्क

सरकार ने आरक्षित श्रेणियों के भीतर 'आय के आधार' पर सब-कोटा की मांग करने वाली याचिका का भी पुरजोर विरोध किया। सरकार ने कोर्ट के सामने कई तर्क रखे।

केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया कि आरक्षण नीति पूरी तरह से आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है। यह मुख्य रूप से जनजाति, सामाजिक पिछड़ेपन और जाति जैसे ऐतिहासिक व सामाजिक मानदंडों पर तय होती है।

सरकार ने कहा कि आरक्षित श्रेणियों में आय-आधारित प्राथमिकता तय करने या किसी भी तरह का बदलाव करने से पहले एक 'समग्र समीक्षा और विस्तृत अध्ययन' की आवश्यकता होगी। इसके लिए लाभार्थियों का सामाजिक-आर्थिक डेटा जुटाना जरूरी है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के 15 जून 2026 के एक हलफनामे का हवाला देते हुए बताया गया कि SC और ST वर्ग में क्रीमी लेयर लागू करने के सवाल पर फैसला लेने का अधिकार केवल संसद के पास है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ऐसी याचिकाओं से दूर रहने का आग्रह किया, जिनमें देश की आरक्षण नीति के स्वरूप को बदलने के लिए न्यायिक निर्देश मांगे जाते हैं।

क्या होता है 'क्रीमी लेयर' का कॉन्सेप्ट?

क्रीमी लेयर का सिद्धांत OBC वर्ग के उन लोगों के लिए लाया गया था, जो आर्थिक और शैक्षणिक रूप से संपन्न हैं। इस नियम के तहत, जिन परिवारों की सालाना आय 8 लाख रुपये (कृषि आय को छोड़कर) या उससे अधिक है, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता है।

'क्रीमी लेयर' शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 1971 में सत्तनाथन आयोग ने किया था, जिसने सिविल पदों के आरक्षण से क्रीमी लेयर को बाहर रखने का निर्देश दिया था। बाद में 1993 में जस्टिस राम नंदन समिति ने भी इसकी पहचान की थी।

वर्तमान में SC और ST वर्ग के लिए ऐसा कोई नियम लागू नहीं है। इन वर्गों के लोगों को उनकी पारिवारिक आय की परवाह किए बिना आरक्षण का लाभ मिलता है।

SC/ST पर क्यों लागू नहीं हो सकता यह नियम?

अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से SC/ST वर्ग के भीतर क्रीमी लेयर की पहचान करने और उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखने को कहा था। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया था कि SC और ST वर्ग के लोगों के साथ होने वाला भेदभाव उनकी आर्थिक स्थिति के कारण नहीं होता है। इसलिए क्रीमी लेयर के कॉन्सेप्ट को इन श्रेणियों पर लागू नहीं किया जा सकता।

सरकार ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि संविधान का मौजूदा ढांचा केवल आर्थिक आधार पर बदलाव की इजाजत नहीं देता। संविधान के अनुच्छेद 341 (अनुसूचित जाति की पहचान), अनुच्छेद 342 (अनुसूचित जनजाति) और अनुच्छेद 342A (सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग) के तहत तय की गई व्यवस्था में सिर्फ आर्थिक स्थिति को पैमाना मानकर कोई फेरबदल नहीं किया जा सकता है।

Amit Kumar

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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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