Explainer: पीएम मोदी ने किया था ऐलान, अब COP33 का होस्ट बनने से भारत का इनकार; अचानक क्या हुआ?

Apr 09, 2026 11:26 am ISTAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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भारत ने 2028 में होने वाले COP33 जलवायु शिखर सम्मेलन की मेजबानी न करने का फैसला किया है। जानें कि कैसे राष्ट्रीय हित, पेरिस समझौते के नियमों पर मतभेद और अपने देश के विकास की जरूरत ने भारत को यह कूटनीतिक कदम उठाने पर विचार करने के लिए मजबूर किया।

पीएम मोदी ने किया था ऐलान, अब COP33 का होस्ट बनने से भारत का इनकार; अचानक क्या हुआ?

भारत ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP33) की 2028 में मेजबानी करने का अपना प्रस्ताव औपचारिक रूप से वापस ले लिया है। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिसंबर 2023 में COP28 (दुबई) में दिए गए प्रस्ताव के ठीक उलट है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सूत्रों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने 2 अप्रैल 2026 को एशिया-पैसिफिक ग्रुप के चेयर को एक पत्र लिखकर यह सूचना दी।

क्या था प्रस्ताव और कैसे हुआ फैसला?

दिसंबर 2023 में COP28 के हाई-लेवल सेगमेंट में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को COP33 का मेजबान बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद BRICS देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) ने जुलाई 2025 में संयुक्त बयान जारी कर भारत के इस प्रस्ताव का स्वागत किया। भारत ने पर्यावरण मंत्रालय के अंदर एक विशेष ‘सेल’ भी बनाई थी, जो COP33 की तैयारियों के लिए काम कर रही थी। भारत ने COP8 (2002, नई दिल्ली) के बाद दूसरी बार COP की मेजबानी करने की तैयारी की थी।

किसी राष्ट्राध्यक्ष द्वारा पांच साल पहले ऐसी सार्वजनिक पेशकश करना एक दुर्लभ और साहसिक कदम था। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि भारत अंतरराष्ट्रीय जलवायु राजनीति में नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहता है। लेकिन हाल के वर्षों में हुए वैश्विक घटनाक्रमों और भारत की अपनी नीतियों में आए बदलावों के कारण अब एक बड़ा पुनर्विचार हुआ है। नतीजतन, भारत ने फैसला किया है कि वह अब COP33 की मेजबानी के लिए बोली नहीं लगाएगा। हालांकि भारत ने इस फैसले के पीछे के कारणों को आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन इस निर्णय के पीछे के नीतिगत और कूटनीतिक कारणों को आसानी से समझा जा सकता है।

राष्ट्रीय हित और विकास को प्राथमिकता

पिछले कुछ वर्षों में भारत के जलवायु दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया है। भारत ने यह महसूस किया है कि पेरिस समझौते का मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढांचा विकासशील देशों, विशेषकर भारत जैसे देश के खिलाफ है। भारत की आबादी बड़ी है और अपने नागरिकों की समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए उसे 'कार्बन स्पेस' की अत्यधिक आवश्यकता है। इसलिए, भारत ने वैश्विक जलवायु चिंताओं के बजाय अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों (विकास और ऊर्जा सुरक्षा) को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है।

पेरिस समझौते के मूल ढांचे पर भारत के सवाल

भारत ने पेरिस समझौते के दृष्टिकोण को चुनौती देना शुरू कर दिया है। भारत का तर्क है कि 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस के मनमाने लक्ष्यों का पीछा करना जलवायु परिवर्तन से निपटने का एकमात्र या सबसे अच्छा तरीका नहीं है। भारत का मानना है कि विकासशील देशों के लिए उत्सर्जन कम करने (शमन) से ज्यादा जरूरी जलवायु प्रभावों के अनुकूल ढलना है। भारत अब "विकास-प्रथम" दृष्टिकोण की वकालत कर रहा है। उसका मानना है कि तेजी से विकास करना जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सबसे बड़ा बचाव है, ठीक वैसे ही जैसे चीन और अमेरिका ने पहले अपनी आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित की। यही कारण है कि इन दोनों देशों ने कभी किसी COP की मेजबानी नहीं की है।

जलवायु वित्त और जीवाश्म ईंधन पर कड़ा रुख

2024 में बाकू (COP29) में जलवायु वित्त पर निराशाजनक परिणामों के बाद भारत ने सख्त रुख अपनाया। भारत पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 को लागू करने की मांग कर रहा है, जिसके तहत विकसित देशों को विकासशील देशों को केवल वित्तीय संसाधन जुटाने के बजाय प्रदान करने चाहिए। विकसित देशों द्वारा जीवाश्म ईंधन से जल्द दूरी बनाने के प्रस्तावों पर भी भारत का रुख कड़ा हो गया है, क्योंकि यह सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है।

COP सम्मेलन के अध्यक्ष और मेजबान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पेरिस समझौते को मजबूती से लागू करने की वकालत करे और देशों पर उत्सर्जन में कटौती का दबाव बनाए। यदि भारत COP33 की मेजबानी करता, तो उसे वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को अपने राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखना पड़ता। अपने विकास-प्रथम मॉडल की वकालत करते हुए सम्मेलन का सफल नेतृत्व करना भारत के लिए एक बड़ा विरोधाभास बन जाता।

'ग्लोबल स्टॉकटेक' (GST) का भारी दबाव

2028 का COP33 बेहद संवेदनशील है क्योंकि इसमें पेरिस समझौते के लक्ष्यों की प्रगति का आकलन करने के लिए दूसरा 'ग्लोबल स्टॉकटेक' (GST) होने वाला है। दुनिया वर्तमान में अपने जलवायु लक्ष्यों से बहुत पीछे है, इसलिए COP33 में सभी देशों पर अपनी प्रतिबद्धताओं को बढ़ाने का भारी दबाव होगा। एक मेजबान के रूप में, दुनिया के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक भारत पर 'उदाहरण पेश करने' और अपने उत्सर्जन को कम करने का भारी दबाव आ जाता।

अमेरिका के पेरिस समझौते से हटने के बाद, अन्य देशों द्वारा महत्वाकांक्षा बढ़ाने से भी जलवायु संकट पर कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। इसके अतिरिक्त, बाकू (2024) और बेलेम, ब्राज़ील (COP30) की बैठकों के बाद विकसित और विकासशील देशों के बीच अविश्वास और विभाजन काफी बढ़ गया है। ऐसे बंटे हुए माहौल में सर्वसम्मति बनाना मेजबान देश के लिए बेहद कठिन काम होता।

IPCC की AR7 रिपोर्ट का विवाद

'इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज' (IPCC) की सातवीं आकलन रिपोर्ट (AR7) 2029 में आनी है, लेकिन कुछ देश दबाव बना रहे हैं कि इसे 2028 में ही GST प्रक्रिया से पहले जारी कर दिया जाए। इस रिपोर्ट में वैश्विक जलवायु की एक गंभीर तस्वीर पेश होने की उम्मीद है, जिससे देशों पर दबाव और बढ़ेगा। भारत और चीन इसका जल्द प्रकाशन नहीं चाहते क्योंकि विकासशील देशों को इसकी समीक्षा का पर्याप्त समय नहीं मिलेगा। यदि भारत COP का अध्यक्ष होता, तो उसके लिए इस रिपोर्ट के जल्द प्रकाशन का विरोध करना लगभग असंभव हो जाता और उसे 'बाधा डालने वाले' के रूप में देखा जाता।

आधिकारिक कारण क्या हो सकते हैं?

भारत का आधिकारिक बयान बहुत संक्षिप्त है। यानी 2028 में भारत के पास पहले से ही कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं और कार्यक्रम हैं, जिनकी समीक्षा के बाद मेजबानी संभव नहीं लगी। COP जैसा विशाल आयोजन (हजारों डेलीगेट्स, सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, खर्च) किसी देश की अन्य प्राथमिकताओं से टकरा सकता है। कुछ रिपोर्टों में संकेत दिया गया है कि संसाधनों की कमी या वैश्विक परिस्थितियों का भी असर हो सकता है, लेकिन सरकार ने इसे सार्वजनिक रूप से नहीं कहा।

अब क्या होगा?

COP की मेजबानी UN के पांच क्षेत्रीय समूहों में बारी-बारी से होती है। 2028 में बारी एशिया-पैसिफिक ग्रुप की थी। भारत के बाहर निकलने के बाद अब दक्षिण कोरिया सबसे मजबूत दावेदार है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने 2025 के चुनाव में COP33 की मेजबानी का वादा किया था और जेओल्लानाम-डो प्रांत ने भी स्थानीय स्तर पर अभियान चलाया था। लेकिन दक्षिण कोरिया का जलवायु मंत्रालय अभी तक औपचारिक रूप से इच्छा नहीं जताया है, क्योंकि 2028 में ही वह G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी कर रहा है। दोनों बड़े आयोजनों को संभालना लॉजिस्टिक और वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। COP31 (2026) तुर्की और ऑस्ट्रेलिया संयुक्त रूप से मेजबानी कर रहे हैं, जबकि COP32 (2027) इथियोपिया में होगा। COP33 का मेजबान दो साल पहले तय होता है, इसलिए अभी भी समय है।

भारत ने COP33 की मेजबानी से हाथ खींच लिया क्योंकि 2028 में अपनी अन्य जलवायु और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की समीक्षा के बाद उसे यह बोझ उठाना उचित नहीं लगा। यह फैसला आश्चर्यजनक है क्योंकि तीन साल पहले भारत खुद आगे बढ़कर प्रस्ताव दे रहा था। अब ग्लोबल साउथ की सबसे बड़ी आवाज वाले देश के रूप में भारत का यह कदम जलवायु कूटनीति में एक नया मोड़ है।

Amit Kumar

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