सुप्रीम कोर्ट के जज ने वकीलों को क्यों दी 'दीवार' और 'काला पत्थर' फिल्म देखने की नसीहत?
अधिवक्ता परिषद द्वारा अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए जस्टिस करोल ने इन सुधारों और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के योगदान पर विस्तार से चर्चा की।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस संजय करोल ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए 4 नए श्रम संहिताओं को भारत की श्रम व्यवस्था में एक युगांतरकारी बदलाव करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह भारत की बिखरी हुई श्रम प्रणाली को एक समावेशी और सुसंगत ढांचे में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय को एक साथ आगे बढ़ाना है। इस दौरान उन्होंने वकीलों को कुछ फिल्में देखने की नसीहत भी दी।
सुप्रीम कोर्ट की इकाई अधिवक्ता परिषद द्वारा अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए जस्टिस करोल ने इन सुधारों और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के योगदान पर विस्तार से चर्चा की।
जस्तीस करोल ने अपने संबोधन में एक दिलचस्प बात कही। उन्होंने बताया कि कैसे हिंदी सिनेमा ने दशकों तक श्रमिक वर्ग के संघर्ष को आवाज दी। उन्होंने 'दो बीघा जमीन' और 'नया दौर' जैसी फिल्मों का जिक्र किया, जो औद्योगिकीकरण और विस्थापन के डर को दिखाती थीं। उन्होंने कहा, "'दीवार' ने ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के साथ हुए धोखे के प्रभाव को दिखाया, तो 'काला पत्थर' ने कोयला खदानों की असुरक्षित स्थितियों और मजदूरों की त्रासदी को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया।" हालांकि, उन्होंने चिंता व्यक्त की कि हाल के दशकों में सिनेमा का झुकाव उपभोक्तावाद और पूंजीवादी कहानियों की ओर बढ़ गया है, जिससे श्रमिक वर्ग की कहानियां हाशिए पर चली गई हैं।
आपको बता दें कि भारत सरकार ने 21 नवंबर, 2025 से चार नई श्रम संहिताएं लागू की हैं, जिनमें 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित किया गया है। इनका उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना, सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार करना है। जस्टिस करोल ने कहा, "ये संहिताएं संवैधानिक आदर्शों को आर्थिक वास्तविकताओं के साथ जोड़ने का प्रयास करती हैं। इनकी सफलता हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता, जवाबदेही और निरंतर सुधार पर निर्भर करेगी।"
उन्होंने विशेष रूप से युवा वकीलों से आह्वान किया कि वे श्रमिकों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आएं, क्योंकि इन कानूनों के वास्तविक कार्यान्वयन में कानूनी बिरादरी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बाबासाहेब को याद करते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि अंबेडकर की महानता इस बात में थी कि वे जमीनी स्तर पर लोगों की समस्याओं को समझते थे और उन्हें ठोस विचारों में बदलने की क्षमता रखते थे।
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एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।
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