1 Km के लिए भी ऑटो! पूर्व NRI महिला ने बताया भारत की सड़कों का कड़वा सच
नुपुर दवे नाम की इस पूर्व एनआरआई महिला ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर कर भारतीय शहरों में पैदल चलने वालों की दिक्कतों और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठाए हैं।
सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु शहर में बुनियादी सुविधाओं और पैदल चलने वालों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। विदेश (NRI) से भारत लौटीं एक महिला ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि कैसे उन्हें महज 1 किलोमीटर दूर जिम जाने के लिए भी रोज ऑटो रिक्शा लेना पड़ता है।
नुपुर दवे नाम की इस पूर्व एनआरआई महिला ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर कर भारतीय शहरों में पैदल चलने वालों की दिक्कतों और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठाए हैं।
1 KM पैदल क्यों नहीं चल सकतीं?
नुपुर दवे के मुताबिक, उनके घर से जिम की दूरी करीब 1.3 किलोमीटर है। इतनी दूरी कोई भी इंसान पैदल तय करना पसंद करेगा, लेकिन उनके रूट पर इतनी बाधाएं हैं कि उन्हें रोज ऑटो का सहारा लेना पड़ता है।
वीडियो में उन्होंने अपनी परेशानियां गिनाते हुए कहा, "रास्ते में फुटपाथ पूरी तरह उबड़-खाबड़, गंदे और अतिक्रमण का शिकार हैं। मेन रोड पर गाड़ियां और स्कूटर बेतरतीब ढंग से पार्क रहते हैं।
उन्होंने कहा कि ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ियां इतनी तेज रफ्तार में निकलती हैं कि जान बचाकर भागना पड़ता है। ऐसा लगता है मानो कोई गाड़ी ऊपर ही चढ़ जाएगी।
उन्होंने बताया कि जब आप जिम के कपड़ों में बाहर निकलते हैं, तो लोग लगातार घूरते हैं, जो काफी असहज करने वाला और गरिमा के खिलाफ महसूस होता है।
"मन की शांति के लिए 100 रुपए देना मंजूर"
नुपुर ने बताया कि वह एनआरआई जीवन छोड़कर भारत आईं, इसलिए कुछ बातों में समझौता करना पड़ता है। हालांकि, वह इस परेशानी को कम करने के लिए रोज ₹100 ऑटो पर खर्च करती हैं।
वह कहती हैं, "मैं हर असुविधा को खत्म नहीं कर सकती, लेकिन मैं यह चुन सकती हूं कि किस परेशानी से बचने के लिए मैं पैसे देने को तैयार हूं। कभी-कभी आपको ज्यादा सख्त बनने की जरूरत नहीं होती, बल्कि जोखिम कम करके अपनी शांति बनाए रखनी होती है।"
सोशल मीडिया पर मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया
नुपुर का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और हजारों लोगों ने उनकी बात से सहमति जताई। कई यूजर्स ने लिखा कि भारत के शहरों में सिविक सेंस और महिलाओं की सुरक्षा के मामले में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है।
एक यूजर ने लिखा, "जब भी हम भारत आते हैं, सड़क की दूसरी तरफ जाने के लिए भी ऑटो लेते हैं। जान है तो जहान है, भले ही ऑटो वाले हंसें।"
दूसरे यूजर ने कमेंट किया, "फुटपाथ पर दुकानें हैं, सड़क पर दुकानदारों की गाड़ियां खड़ी हैं। इंसान चले तो कहां चले? ऊपर से लोग हर कदम पर घूरते हैं। ऐसे में 'उबर ऑटो जिंदाबाद' ही एकमात्र सहारा है।"
एक और महिला यूजर का कहना था, "भारत में सड़कों पर सब कुछ होता है- लोग चाय पीते हैं, थूकते हैं, बर्तन धोते हैं, बस सही तरीके से गाड़ी नहीं चलाते और दूसरों को घूरते हैं।"


