कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती? हत्या के आरोपी नक्सली को कोर्ट ने किया बरी, जांच रिपोर्ट भी गुम
बीजेपी सरकार स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की विरासत को पुनर्स्थापित करने के लिए कई कदम उठा रही है। फूलबनी में नए मेडिकल कॉलेज का नाम स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के नाम पर रखा गया है।

ओडिशा की राजनीति में पूर्व वीएचपी (VHP) नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या का मुद्दा तूल पकड़ लिया है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी तक का बयान इस मामले में सामने आ चुका है। उनकी 100वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार 2008 में हुई स्वामीजी की हत्या के पीछे के सच को सामने लाएगी। मुख्यमंत्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, "स्वामीजी के खून की एक-एक बूंद को न्याय मिलेगा।"
हाल ही में एक विशेष अदालत के द्वारा इस हत्याकांड के मुख्य आरोपी माओवादी नेता डी केसब राव उर्फ आजाद को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। पुलिस ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या में माओवादी नेता को मुख्य साजिशकर्ता बताया था। वह भुवनेश्वर की झारपाड़ा जेल में 15 साल तक बंद रहा।
कोर्ट को नहीं मिला पत्र
हत्या के समय पुलिस ने दावा किया था कि माओवादियों ने आजाद के हस्ताक्षर वाला एक पत्र छोड़ा था, जिसमें बंसधारा डिविजन के माओवादियों द्वारा हत्या की जिम्मेदारी ली गई थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ऐसा कोई पत्र कोर्ट के समक्ष पेश ही नहीं किया गया। इस मामले में वीएचपी और अन्य हिंदूवादी संगठन इस मामले की सीबीआई जांच की मांग पर अड़े हुए हैं।
इससे पहले अक्टूबर 2013 में फूलबनी की एक अदालत ने इस हत्या के सिलसिले में आठ लोगों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिनमें से अधिकांश लगभग 10 साल जेल में बिताने के बाद फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।
कैसे हुई थी हत्या?
23 अगस्त 2008 को कंधमाल जिले के जलेस्पेटा स्थित आश्रम में जन्माष्टमी उत्सव के दौरान 20-25 नकाबपोश हमलावरों ने 84 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार सहयोगियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। स्वामीजी ने आदिवासियों के बीच शिक्षा, विशेषकर लड़कियों के लिए आवासीय विद्यालय स्थापित किए थे। उन्होंने क्षेत्र में धर्मांतरण और गोहत्या के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया था।
इस घटना के बाद कंधमाल में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। इस दंगे के गहरे राजनीतिक परिणाम देखने को मिले। तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजेडी (BJD) ने 2009 के चुनावों से ठीक पहले भाजपा से अपना 9 साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया था।
गायब हुईं जांच आयोग की रिपोर्ट
2008 के दंगों की जांच के लिए पटनायक सरकार ने पहले न्यायमूर्ति एस सी महापात्रा और उनके निधन के बाद न्यायमूर्ति ए एस नायडू की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। नायडू आयोग ने दिसंबर 2015 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन तत्कालीन बीजेडी सरकार ने इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया। 2024 में सत्ता में आई भाजपा ने जून 2026 में एक एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि कंधमाल दंगे और 2016 के SUM अस्पताल अग्निकांड से जुड़ी दोनों न्यायिक रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय से गायब हैं।
माझी सरकार का आरोप है कि जून 2024 में चुनाव परिणामों के दौरान जब फाइलें वापस की जा रही थीं, तब इन महत्वपूर्ण रिपोर्टों को जानबूझकर छिपाया या नष्ट किया गया। इस सिलसिले में पुलिस ने नवीन पटनायक के करीबी पूर्व नौकरशाह वीके पांडियन सहित चार रिटायर अधिकारियों को समन जारी किया है।
बीजेपी सरकार स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की विरासत को पुनर्स्थापित करने के लिए कई कदम उठा रही है। फूलबनी में नए मेडिकल कॉलेज का नाम स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के नाम पर रखा गया है। जलेस्पेटा आश्रम और कन्याश्रम के पुनर्विकास के लिए मुख्यमंत्री विशेष सहायता (CMSA) से 13 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। स्वामीजी के पैतृक गांव गुरुजांगा को हेरिटेज विलेज के रूप में विकसित करने की घोषणा की गई है।
बीजेडी ने मुख्यमंत्री के आरोपों को निराधार बताया है। प्रवक्ता लेनिन मोहंती ने कहा कि 2008 में जब यह घटना हुई थी तब मौजूदा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल और पूर्व राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन भी पटनायक मंत्रिमंडल का हिस्सा थे। बीजेडी ने यह सवाल भी उठाया कि दो साल तक सत्ता में रहने के बाद सरकार को रिपोर्ट गायब होने की बात याद क्यों आई।


