Explainer: आतंकवाद के काल या गुनहगार, कौन थे 'सुपरकॉप' KPS गिल? पंजाब 95 विवाद की पूरी कहानी
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'Satluj' (Punjab 95) को ZEE5 से क्यों हटाया गया? जानिए 'सुपरकॉप' KPS Gill, जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी और 90 के दशक के पंजाब का वो पूरा सच जिसपर मचा है देश में भारी बवाल।

कल्पना कीजिए 1980-90 के दशक का पंजाब। सड़कों पर खून बह रहा है। स्कूल-कॉलेज बंद, खेत सूने पड़े हैं। हर दिन अखबारों में नई खबर- किसी पुलिस अधिकारी की हत्या, किसी गांव में बम ब्लास्ट, या फिर किसी युवक का 'एंकाउंटर'। एक तरफ खालिस्तानी आतंकवादी पाकिस्तान से हथियार और ट्रेनिंग लेकर भारत को तोड़ने पर आमादा। दूसरी तरफ राज्य की पुलिस और सरकार, जो किसी भी कीमत पर शांति लाना चाहती है। और इस जंग के बीच खड़ा है एक आदमी- कंवर पाल सिंह गिल यानी केपीएस गिल।
हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज हुई दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को रिलीज होने के महज 48 घंटे के भीतर ही हटा दिया गया है। इस फिल्म का पुराना नाम 'Punjab 95' था। भारत सरकार के कथित निर्देश के बाद उठाए गए इस कदम ने एक बार फिर 90 के दशक के पंजाब और तत्कालीन पुलिस प्रमुख केपीएस गिल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आइए समझते हैं कि आखिर केपीएस गिल कौन थे, 'पंजाब 95' की असल कहानी क्या है और यह ताजा विवाद क्यों गहराता जा रहा है।
केपीएस गिल: 'सुपरकॉप' या विवादित पुलिस अधिकारी?
कंवर पाल सिंह गिल जिन्हें शॉर्ट में केपीएस गिल के नाम से जाना जाता है। वे दो बार पंजाब के पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे। उन्हें 1980 और 90 के दशक में पंजाब और असम से उग्रवाद (विशेषकर खालिस्तानी आतंकवाद) को खत्म करने का श्रेय दिया जाता है। KPS गिल का जन्म 29 दिसंबर 1934 को लाहौर (तब ब्रिटिश इंडिया) में जट सिख परिवार में हुआ। वे 1958 में IPS में शामिल हुए। असम-मेघालय कैडर मिला। नॉर्थ-ईस्ट में उनकी तगड़ी इमेज बनी। कोई नॉनसेंस नहीं, सिर्फ सख्त एक्शन।
इस दौरान 1984 में स्वर्ण मंदिर से भिंडरांवाले और अन्य खालिस्तानी आतंकवादियों को निकालने के लिए आर्मी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया। भारी नुकसान, आगजनी हुई। सिखों के गुस्से की आग सुलग उठी। इंदिरा गांधी की हत्या, फिर 1984 के सिख विरोधी दंगे हुए। पंजाब जल रहा था। खालिस्तान मूवमेंट ने जोर पकड़ा- पाकिस्तान का सपोर्ट, हथियार, ट्रेनिंग, टारगेटेड किलिंग्स... पंजाब में यह सब चल रहा था।
फिर 1988 में कंवर पाल सिंह गिल को पंजाब पुलिस का DGP बनाया गया। उनका पहला बड़ा काम था- ऑपरेशन ब्लैक थंडर। 'ऑपरेशन ब्लैक थंडर' को स्वर्ण मंदिर में बिना किसी बड़े नुकसान के आतंकियों को सरेंडर कराने के लिए जाना जाता है। 67 सरेंडर हुए, कुछ मारे गए। ब्लू स्टार से सबक लिया गया था यानी मिनिमम फोर्स, पब्लिक स्क्रूटनी। यह उनकी पहली बड़ी जीत थी। उनके सख्त रवैये और आतंकवाद को कुचलने की रणनीति के कारण उन्हें देश भर में 'सुपरकॉप' का तमगा मिला।
दूसरी बार बने पुलिस चीफ और बदल गया पंजाब
केपीएस गिल 1991-95 में फिर दूसरी बार DGP बने। दरअसल 1991 में पंजाब में हिंसा फिर चरम पर थी। 5000 से ज्यादा मौतें हुईं। गिल ने "बुलेट फॉर बुलेट" यानी गोली के बदले गोली की पॉलिसी अपनाई। लोकल इंटेलिजेंस, मुखबिरों का नेटवर्क खड़ा किया। इनाम सिस्टम यानी मिलिटेंट मारने पर रिवॉर्ड देने की नीति बनाई। पुलिस को मोटिवेट किया, मॉरल बूस्ट दिया। 1993 तक मौतें घटकर 500 से नीचे आ गईं। 1995 तक पंजाब से मिलिटेंसी लगभग खत्म हो चुकी थी।
हीरो या विलेन?
समर्थक कहते हैं कि गिल ने पंजाब को बचाया। बिना उनकी सख्ती के आज पंजाब कश्मीर जैसा हो सकता था। तवलीन सिंह जैसे पत्रकार उन्हें क्रेडिट देते हैं। 1989 में उन्हें पद्म श्री मिला। पंजाब पुलिस के कई अफसर आज भी उन्हें गुरु मानते हैं। हालांकि आतंकवाद को खत्म करने के उनके तरीकों पर गंभीर सवाल उठे। उन पर और पंजाब पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर, अवैध हिरासत और मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के आरोप लगे। उनके कार्यकाल में कई निर्दोष युवाओं के गायब होने के मामले सामने आए, जिसने उन्हें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नजर में एक बेहद विवादित चेहरा बना दिया। अब पंजाब 95 का असली विवाद समझते हैं।
'Punjab 95' (सतलुज) क्या है?
हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित यह फिल्म असल में पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की सच्ची कहानी पर आधारित है। फिल्म में खालड़ा की मुख्य भूमिका दिलजीत दोसांझ ने निभाई है।
एक बैंक कर्मचारी रहे जसवंत सिंह खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब पुलिस द्वारा 'लावारिस' बताकर जला दिए गए हजारों अज्ञात शवों के सबूत जुटाए थे। खालड़ा ने पंजाब में 1984-94 के बीच 25,000 अनक्लेम्ड शवों के क्रिमेशन का दावा किया। रिकॉर्ड्स इकट्ठे किए, इंटरनेशनल फोरम (कनाडियन हाउस ऑफ कॉमन्स तक) पहुंचाया। KPS गिल को सीधे नाम लेकर चैलेंज किया। उन्होंने दावा किया था कि ये वे युवा थे जिन्हें पुलिस ने अवैध रूप से मार दिया था।
खालड़ा हुए गायब
6 सितंबर 1995 को खालड़ा को घर के बाहर कार धोते वक्त अगवा कर लिया गया। गवाहों ने पुलिस कर्मियों को देखा था। बाद में सीबीआई जांच में साबित हुआ कि पंजाब पुलिस के अधिकारियों ने ही उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी। इस मामले में 2005 में पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा भी हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में पंजाब पुलिस की आलोचना की। लेकिन गिल पर सीधा केस नहीं चला। खालड़ा की बॉडी भी कभी नहीं मिली।
सीएम बेअंत सिंह की हत्या का कनेक्शन
सतलुज फिल्म में इस घटना को थोड़ा फिक्शनलाइज्ड तरीके से दिखाया गया है। फिल्म में CM का नाम बदलकर अनंत सिंह रखा गया। असल घटना 31 अगस्त 1995 की है।
बेअंत सिंह 1992 से पंजाब के कांग्रेस CM थे। KPS गिल के साथ मिलकर उन्होंने मिलिटेंसी के खिलाफ सख्त अभियान चलाया। "बुलेट फॉर बुलेट" पॉलिसी, इनाम सिस्टम और पुलिस एक्शन से आतंकवाद काफी हद तक काबू में आ गया था।
31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ के सिविल सेक्रेटेरिएट में उनकी कार के पास सुसाइड बम ब्लास्ट हुआ। बब्बर खालसा इंटरनेशनल वाले दिलावर सिंह बब्बर ने खुद को ब्लास्ट किया। बैकअप बॉम्बर बलवंत सिंह राजौना भी शामिल था, जो बाद में पकड़ा गया। इस हमले में CM समेत 17 लोग मारे गए। यह पंजाब में उच्च स्तर की सबसे बड़ी राजनीतिक हत्या थी।
KPS Gill का क्या हुआ?
हत्या के बाद गिल DGP बने रहे, लेकिन राजनीतिक बदलावों और केंद्र में सरकार बदलने से उनका प्रभाव कम हुआ। 1995 में वे रिटायर हो गए। उन्होंने इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट बनाया। असम, गुजरात, श्रीलंका आदि जगहों पर आतंकवाद पर सलाह दी। गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें सिक्योरिटी एडवाइजर बनाया था। 26 मई 2017 को दिल्ली में हार्ट अटैक से 82 साल की उम्र में वे गुजर गए।
आखिर ताजा विवाद क्या है?
यह फिल्म पिछले लगभग तीन सालों से सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) में फंसी थी। बोर्ड ने इसमें 127 कट लगाने, नाम बदलने (Punjab 95 से Satluj करने) और कई दृश्यों को हटाने जैसी मांगें रखी थीं।
3 जुलाई 2026 को मेकर्स ने इसे ZEE5 पर बिना किसी कट के 'सतलुज' नाम से रिलीज कर दिया। दिलजीत दोसांझ ने खुशी जताते हुए कहा था कि फिल्म बिना किसी समझौते के अपने मूल रूप में रिलीज हुई है।
रिलीज के महज दो दिन (48 घंटे) बाद, भारत सरकार के निर्देशों का हवाला देते हुए ZEE5 ने इसे अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। फिल्म के हटाए जाने के बाद इसके पायरेटेड वर्जन ऑनलाइन वायरल हो गए। राम गोपाल वर्मा (RGV), अनुराग कश्यप और सांसद व पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह जैसी हस्तियों ने फिल्म के समर्थन में आवाज उठाई है। मेकर्स अब इस अचानक हुए बैन के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
एक बात साफ है- पंजाब का वह दौर बहुत मश्किल था। आतंकवादियों ने हजारों निर्दोष मारे- पुलिसकर्मी, राजनेता, आम लोग, हिंदू अल्पसंख्यक। पाकिस्तान का रोल साफ था। राज्य की प्रतिक्रिया भी सख्ती वाली थी- क्योंकि लोकतंत्र में आतंक को सहन नहीं किया जा सकता है। केपीएस गिल ने मिलिटेंसी खत्म की- यह फैक्ट है। लेकिन तरीके विवादास्पद रहे। यह भी एक फैक्ट है। हजारों मौतें हुईं, कई निर्दोष भी मारे गए।
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लेखक के बारे में
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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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