
मौलिक अधिकार नहीं WhatsApp, लेडी डॉक्टर को SC से झटका; साथ में मिली ये मुफ्त सलाह
संक्षेप: मामले में पेश वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता डॉक्टर, जिनका एक क्लिनिक और एक पॉलीडायग्नोस्टिक सेंटर है, अपने ग्राहकों से व्हाट्सएप के जरिए संवाद कर रहे थे और पिछले 10-12 वर्ष से इस मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में कहा है कि व्हाट्सएप तक सभी नागरिकों की पहुंच मौलिक अधिकार नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उस महिला डॉक्टर की याचिका खारिज कर दी, जिन्होंने दावा किया था कि व्हाट्सएप तक उनकी पहुँच उनका मौलिक अधिकार है और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म उनका अकाउंट ब्लॉक नहीं कर सकता। उनकी इस याचिका पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि एक निजी मैसेजिंग सेवा का दुरुपयोग संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकारों के दायरे में नहीं आता है।

इस मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ने सेवा का दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए याचिकाकर्ता का व्हाट्सएप अकाउंट ब्लॉक कर दिया था, जिसे फिर से बहाल कराने के लिए उन्होंने शीर्ष न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता डॉ. रमन कुंद्रा ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि यह प्लेटफॉर्म उनके पेशेवर और व्यक्तिगत संचार के लिए जरूरी है । इसके अलावा अर्जी में इस तरह की सेवा का परिचालन करने वाली कंपनियों के विनियमन के लिए अखिल भारतीय स्तर पर दिशानिर्देश जारी करने का भी अनुरोध किया गया था लेकिन कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
व्हाट्सएप एक निजी संस्था
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि व्हाट्सएप एक निजी संस्था है और उपयोगकर्ता इसकी सेवा शर्तों से बाध्य नहीं हैं। अदालत ने डॉक्टर को ज़ोहो द्वारा बनाए गए देशी अराट्टाई ऐप जैसे अन्य वैकल्पिक मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने की भी सलाह दी। पीठ ने टिप्पणी की, “आप अराट्टाई का उपयोग कर सकते हैं।”
अधिकार का दावा नहीं कर सकते
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस तथ्य पर जोर दिया कि व्हाट्सएप जैसे निजी डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुँच भारत के संविधान के तहत एक गारंटीकृत अधिकार नहीं है। पीठ ने कहा कि डिजिटल संचार महत्वपूर्ण है, लेकिन उपयोगकर्ताओं को प्लेटफॉर्म की नीतियों का पालन करना होगा और वे निजी तौर पर संचालित सेवाओं के लिए अधिकार का दावा नहीं कर सकते। इसके साथ ही, पीठ ने व्हाट्सएप की कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन मानने संबंधी किसी भी अन्य तर्क पर विचार करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसे दावों का समाधान उचित नियामक या नागरिक माध्यमों से किया जाना चाहिए।





