Explainer: भारत के खिलाफ चीन से मदद मांगने पहुंचा बांग्लादेश, क्या है तीस्ता नदी वाला विवाद?

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, ढाका
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बांग्लादेश की नई सरकार ने तीस्ता नदी प्रोजेक्ट के लिए चीन से मदद मांगी है। जानिए ड्रैगन की इस एंट्री से भारत की सुरक्षा, कूटनीति और 'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को क्या बड़ा खतरा है। समझें पूरा तीस्ता जल विवाद।

भारत के खिलाफ चीन से मदद मांगने पहुंचा बांग्लादेश, क्या है तीस्ता नदी वाला विवाद?

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में सियासी हवा क्या बदली, भारत के लिए एक पुरानी टेंशन फिर से नई होकर सामने आ गई है। खबर है कि तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश सरकार ने तीस्ता नदी पुनरुद्धार परियोजना के लिए औपचारिक रूप से चीन से समर्थन मांगा है। यह कदम भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर असर डाल सकता है। बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी 'बांग्लादेश संगबाद संस्था' (बीएसएस) के अनुसार, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान और चीन के उनके समकक्ष वांग यी के बीच बुधवार को बीजिंग में हुई बैठक में तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन एवं पुनरुद्धार परियोजना (टीआरसीएमआरपी) से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। अब सवाल उठता है कि क्या भारत के खिलाफ बांग्लादेश की मदद कर सकता है चीन? क्या है तीस्ता नदी वाला विवाद? आइए, इस पूरी जियो-पॉलिटिक्स को तीन आसान हिस्सों में समझते हैं।

जड़ कहां है: क्या है तीस्ता नदी का पूरा विवाद?

कहानी शुरू होती है सिक्किम के ग्लेशियरों से। तीस्ता नदी सिक्किम में पौहुनरी पर्वत से शुरू होकर पश्चिम बंगाल (उत्तर बंगाल) से गुजरती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है और ब्रह्मपुत्र नदी में मिल जाती है। कुल लंबाई करीब 414 किमी है। भारत में यह सिक्किम और पश्चिम बंगाल के कृषि, सिंचाई और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि बांग्लादेश में उत्तरी जिलों (रंगपुर, दीनाजपुर आदि) की कृषि, खाद्य सुरक्षा और लाखों किसानों की आजीविका पर निर्भर है।

दिक्कत मॉनसून में नहीं, सर्दियों और गर्मियों (दिसंबर से मई) में होती है। तब पानी कम हो जाता है। बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से के लाखों किसान इसी नदी पर जिंदा हैं। पानी नहीं मिलता, तो उनकी फसलें सूख जाती हैं।

2011 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ढाका दौरे पर तीस्ता के पानी का 50-50 बंटवारा होने ही वाला था, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वीटो लगा दिया। उनका सीधा तर्क था- हमारे पास उत्तर बंगाल के अपने किसानों के लिए ही पर्याप्त पानी नहीं है, तो हम बांग्लादेश को क्या दें? तब से लेकर आज तक, यह समझौता अटका हुआ है और बांग्लादेश में इसे लेकर भारत के खिलाफ एक गुस्सा सुलगता रहा है।

चीन की एंट्री: 'तीस्ता रिवर प्रोजेक्ट' क्या बला है?

जब पानी के बंटवारे पर बात नहीं बनी, तो बांग्लादेश ने एक नया प्लान सोचा- तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना (TRMP)। प्लान यह था कि मॉनसून में जो अतिरिक्त पानी आता है, उसे स्टोर करने के लिए नदी की गहरी खुदाई की जाए, बड़े-बड़े जलाशय और मजबूत बांध बनाए जाएं। इस पूरे मेगा प्रोजेक्ट का खर्च था करीब 1 बिलियन डॉलर।

यहीं से ड्रैगन यानी चीन की एंट्री होती है। चीन काफी समय से इस प्रोजेक्ट को फंड करने और अपने इंजीनियर भेजने के लिए लार टपका रहा था। पहले शेख हसीना की सरकार थी। वो जानती थीं कि अगर इसमें चीन को घुसाया, तो भारत नाराज हो जाएगा। इसलिए हसीना सरकार ने इसे होल्ड पर रखा हुआ था। लेकिन अब तख्तापलट के बाद, तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार ने भारत की उस 'रेड लाइन' को पार करते हुए औपचारिक रूप से चीन को न्योता दे दिया है।

भारत की असली टेंशन: पानी नहीं, 'चिकन नेक' है मुद्दा

अगर आपको लग रहा है कि भारत की चिंता सिर्फ पानी है, तो आप गलत हैं। असली खेल तो सिक्योरिटी और स्ट्रेटेजी का है।

चिकन नेक का खतरा: तीस्ता नदी का वह इलाका भारत के 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' के बेहद करीब है। इसे 'चिकन नेक' कहते हैं। यह 22 किलोमीटर चौड़ा वही संकरा रास्ता है, जो पूरे नॉर्थ-ईस्ट (पूर्वोत्तर राज्यों) को बाकी भारत से जोड़ता है। भारत कभी नहीं चाहेगा कि चीन के इंजीनियर, उनकी मशीनरी और उनका जासूसी सिस्टम भारत की इस सबसे संवेदनशील नस के इतने करीब आकर बैठे।

डेटा की चोरी: इस प्रोजेक्ट के बहाने चीन के हाथ उस पूरे इलाके का हाइड्रोलॉजिकल (पानी और जमीन से जुड़ा) डेटा लग जाएगा, जिसका इस्तेमाल वह भविष्य में किसी भी सैन्य या रणनीतिक प्लानिंग के लिए कर सकता है।

कर्ज का जाल: श्रीलंका और मालदीव का हाल दुनिया ने देखा है। भारत को डर है कि ढाका भी बीजिंग की 'डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज के जाल) में न फंस जाए।

लब्बोलुआब: अब आगे क्या?

तारिक रहमान सरकार का यह कदम भारत पर दबाव बनाने की एक कूटनीतिक चाल भी हो सकता है- कि "या तो आप तीस्ता का पानी दो, या हम चीन के पास जा रहे हैं।"

भारत ने कुछ समय पहले खुद ऑफर दिया था कि इस प्रोजेक्ट की फंडिंग हम कर देंगे, ताकि चीन को दूर रखा जा सके। लेकिन अब बांग्लादेश की नई सरकार का रुख भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक सिरदर्द बन गया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि साउथ ब्लॉक इस 'चाइनीज बाउंसर' को कैसे डक करता है।

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