Hindi NewsIndia NewsWhat is Section 17A of Anti Corruption Act, 1988 Why Supreme Court judges divided? When and why this provision added
क्या है एंटी करप्शन एक्ट की धारा 17A, जिस पर बंट गए SC के जज; कब और क्यों जोड़ा गया था प्रावधान?

क्या है एंटी करप्शन एक्ट की धारा 17A, जिस पर बंट गए SC के जज; कब और क्यों जोड़ा गया था प्रावधान?

संक्षेप:

शीर्ष अदालत की पीठ द्वारा खंडित फैसला सुनाए जाने के बाद ये चर्चा जो पकड़ रही है कि एंटी करप्शन एक्ट की धारा 17A आखिर है क्या, जिस पर जज एक राय नहीं हैं। फिलहाल यह मामला CJI सूर्यकांत को भेजा गया है जो इस पर अब बड़ी पीठ की गठन करेंगे।

Jan 13, 2026 03:43 pm ISTPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Prevention Of Corruption Act 1988 Section 17A: सुप्रीम कोर्ट ने आज (मंगलवार, 13 जनवरी को) लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू करने से पहले अनुमति लेने से संबंधित, भ्रष्टाचार रोधी कानून की 2018 की धारा की संवैधानिक वैधता पर बंटा हुआ फैसला सुनाया है। SC की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने जहां कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए, वहीं दूसरे न्यायाधीश जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा कि ये धारा संवैधानिक है और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

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शीर्ष अदालत की पीठ द्वारा खंडित फैसला सुनाए जाने के बाद ये चर्चा जो पकड़ रही है कि एंटी करप्शन एक्ट की धारा 17A आखिर है क्या, जिस पर जज एक राय नहीं हैं। फिलहाल यह मामला CJI जस्टिस सूर्यकांत को भेजा गया है जो इस मामली सुनवाई के लिए एक उच्चतर पीठ की गठन करेंगे।

क्या है एंटी करप्शन एक्ट की धारा 17A?

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A, वर्ष 2018 के जुलाई माह में एक संशोधन के जरिए जोड़ी गई थी। यह धारा यह किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान की गई सिफारिशों या निर्णयों के लिए बिना पूर्व अनुमति (Prior Sanction) के पूछताछ या जाँच पर रोक लगाता है। बिना पूर्व अनुमति के इन अधिकारियों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। ताकि ईमानदार अधिकारियों को इस एक्ट का दुरुपयोग कर बेवजह परेशान न किया जाए। इन मामलों में सक्षम प्राधिकारी अक्सर सरकार या संबंधित विभाग होता है, जो जांच की अनुमति देता है।

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अधिकारी राजनीतिक बदले का शिकार न बनें

धारा 17A का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि ईमानदार अधिकारी सरकार बदलने के बाद राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार न बनें। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में इसकी संवैधानिकता पर विवाद चल रहा है। यह धारा अधिकारियों को सुरक्षा देती है, लेकिन कुछ जजों ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की है, जबकि अन्य ने इसे वैध माना है, जिस पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी।

एक NGO का तर्क- ये प्रावधान एक्ट को कमजोर बनाता है

एक गैर-लाभकारी संगठन ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार रोधी कानून को कमजोर करता है क्योंकि सरकार स्वयं सक्षम प्राधिकारी होने के कारण निष्पक्ष जांच को बाधित करती है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पूर्वानुमति की आवश्यकता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विरुद्ध है; इससे जांच में रुकावट आती है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचने का मौका मिल जाता है।

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जस्टिस नागरत्ना ने क्या कहा?

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। जांच शुरू करने से पहले किसी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पूर्व मंजूरी की शर्त अधिनियम के उद्देश्य के खिलाफ है। इससे जांच में रुकावट आ सकती है और ईमानदार अधिकारियों के बजाय भ्रष्ट लोकसेवकों को संरक्षण मिलता है।” वहीं, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा, “धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है, बशर्ते मंजूरी देने का फैसला लोकपाल या राज्य का लोकायुक्त करे। इस प्रावधान से ईमानदार अधिकारियों की रक्षा होगी और भ्रष्ट लोगों के लिए सजा सुनिश्चित होगी। इससे प्रशासनिक व्यवस्था में देश की सेवा के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभावान व्यक्तियों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।”

What is Anti Corruption Act 1988 Section 17A

अब CJI के समक्ष मामला

अब यह मामला भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाएगा, ताकि एक बड़ी पीठ का गठन कर इस पर अंतिम निर्णय लिया जा सके। पीठ ने कहा, “हमारे अलग-अलग मतों को देखते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि इस मामले को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि उपयुक्त पीठ का गठन करके इससे जुड़े मुद्दों पर नए सिरे से विचार किया जा सके।”एनजीओ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करता है, क्योंकि सरकार से अक्सर मंजूरी नहीं मिलती, जबकि वही इस कानून के तहत ‘सक्षम प्राधिकारी’ है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पक्ष रखा। (भाषा इनपुट्स के साथ)

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लेखक के बारे में

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प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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