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क्या था सलवा जुडूम? जिसे लेकर विपक्ष के VP कैंडिडेट को बार-बार निशाना बना रहे अमित शाह

क्या था सलवा जुडूम? जिसे लेकर विपक्ष के VP कैंडिडेट को बार-बार निशाना बना रहे अमित शाह

संक्षेप: What is Salwa Judum: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर से विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम को खारिज कर दिया गया था, शायद वामपंथ की और यही झुकाव उनके चुने जाने का कारण है।

Mon, 25 Aug 2025 12:29 PMUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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Amit Shah: उपराष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष की तरफ से पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी का नाम सामने आने के बाद से गृहमंत्री अमित शाह लगातार उन पर निशाना साध रहे हैं। उनके इस निशाने के केंद्र में है नक्सलियों के विरोध में चलाया गया अभियान 'सलवा जुडूम', जिसे सुदर्शन रेड्डी ने न्यायाधीश रहते हुए प्रतिबंधित करवा दिया था। गृहमंत्री का आरोप है कि उस फैसले की वजह से ही आज भी इस देश में नक्सलवाद जिंदा है। अगर यह फैसला नहीं आता तो नक्सलवाद तभी समाप्त हो गया होता।

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गृहमंत्री के इस आरोप को लेकर रेड्डी ने भी बयान दिया है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम को खारिज करने का फैसला उनका निजी फैसला नहीं था। यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला था। इस फैसले को लगभग 50 पन्नों में जारी किया गया था। गृहमंत्री ने अगर यह फैसला पढ़ा होता तो शायद वह ऐसी टिप्पणी नहीं करते।

दोनों तरफ से जारी आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर के बीच आइए जानते हैं क्या है सलवा जुडूम की कहानी, जिसे लेकर आज भी नक्सलियों के दिमाग में डर भरा है। लेकिन जिन नेताओं ने इसे लागू किया था, उनसे इसका बदला नक्सलियों ने बेहद ही खूनी तरीके से लिया था।

क्या है सलवा जुडूम?

सलवा जुडूम, गोंडी भाषा के इस शब्द का अर्थ है शांति अभियान होता है। लेकिन इसका काम इससे बिल्कुल उलट था। दरअसल, यह एक हथियारबंद संगठन था, जिसे राज्य सरकार और सुरक्षबलों का समर्थन प्राप्त था। स्थानीय लोगों से मिलकर बने इस संगठन का काम सुरक्षा बलों की मदद करना और नक्सलियों से सीधे तौर पर मुकाबला करना था। इसकी स्थापना करने का श्रेय कांग्रेस के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा को दिया जाता है।

सरकार ने उपलब्ध कराए संसाधन

भाजपा की रमन सरकार के दौर में महेंद्र कर्मा ने नक्सलियों के खिलाफ इस अभियान की शुरुआत की। सरकार के समर्थन के चलते आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी बनाया गया। इतना ही नहीं इन्हें 3000 रुपए मासिक तनख्वाह और लड़ने के लिए एक बंदूक भी दी गई। जंग में उतरे इन आदिवासी नौजवानों ने नक्सलियों की नाक में द कर दिया। जगह-जगह पर लोगों ने नक्सलियों को मारकर भगाना शुरू कर दिया। लेकिन इसका दूसरा परिणाम भी हुआ। अपना डर खत्म होता देख नक्सलियों ने गांव में लोगों को खड़े करके और पुलिस की मुखबरी का आरोप लगाकर लोगों को मारना शुरू कर दिया।

सलवा जुडूम में शामिल हुए युवाओं को परिवारों को सरकारी राहत शिविरों में रखा गया। इससे नक्सलियों ने इनके ऊपर भी हमले करना शुरू कर दिया। इस संगठन का नक्सलियों के ऊपर तो बुरा असर पड़ा, लेकिन आम आदिवासियों के जीवन पर भी असर पड़ा। इस संगठन के ऊपर मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगा। एक सुशिक्षित आर्मी के मुकाबले यह केवल थोड़ी सी ट्रेनिंग पाए गरीब लोग थे, जिन्होंने बंदूक की दम पर अपनी पुरानी रंजिशों का हिसाब करना भी शुरू कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

बढ़ते खून-खराबे को देखते हुए कई संगठनों ने इस अभियान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। इसके बाद वर्तमान में विपक्ष के उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार और तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी की बेंच ने 5 जुलाई 2011 को इस संगठन को असंवैधानिक घोषित करते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया। इतना ही नहीं कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को आदेश दिया कि इन लोगों के पास में मौजूद तमाम हथियारों को भी जब्त कर लिया जाए।

कोर्ट के इस आदेश के बाद सरकार के साथ मिलकर लड़ने वाले आदिवासी युवा एक तरीके से अनाथ वाली स्थिति में आ गए। उनके पास मौजूद हथियारों को भी उनसे ले लिया गया। अब वह नक्सलवादियों के लिए एक आसान टारगेट थे। ऐसे में सरकार ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की, लेकिन तब भी नक्सलियों के हौसले बुलंद होते गए।

खूनी बदला

सलवा जुडूम के नेतृत्व करता छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा आदिवासियों के निशाने पर थे। इस पर बैन लगने के ठीक दो साल के बाद 25 मई 2013 के घात लगाए बैठे नक्सलियों ने कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के काफिले पर हमला कर दिया। इस हमले में महेंद्र कर्मा समेत सभी 24 लोगों की हत्या कर दी गई।

गौरतलब है कि सलवा जुडूम अभियान की वजह से नक्सलियों के पांव उखड़ने लगे थे। इसलिए इसकी देखा देखी अन्य राज्यों में भी इसी से मिलते जुलते अभियान शुरू किए गए। झारखंड,कर्नाटक और आंध्रप्रदेश जैसे नक्सल प्रभावित राज्यों में भी ऐसे संगठन बनाए गए। नक्सलियों के खिलाफ इन लोगों का इस्तेमाल किया जाने लगा। क्योंकि यह लोग स्थानीय भूगोल से अच्छी तरह से परिचित थे और सुरक्षाबलों की मदद कर सकते थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इन्हें केवल मदद के लिए रखा जाने लगा।

Upendra Thapak

लेखक के बारे में

Upendra Thapak
उपेन्द्र पिछले कुछ समय से लाइव हिन्दुस्तान के साथ बतौर ट्रेनी कंटेंट प्रोड्यूसर जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली (2023-24 बैच) से पूरी की है। इससे पहले भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय से अपना ग्रैजुएशन पूरा किया। मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के रहने वाले हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, राजनीति के साथ-साथ खेलों में भी दिलचस्पी रखते हैं। और पढ़ें
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