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क्या है TMC का 'लोक्खी एलो घोरे' दांव? बंगाल चुनाव से पहले दीदी का महिलाओं-लाभुकों पर फिल्मी डोरे

क्या है TMC का 'लोक्खी एलो घोरे' दांव? बंगाल चुनाव से पहले दीदी का महिलाओं-लाभुकों पर फिल्मी डोरे

संक्षेप:

पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी की परिकल्पना और मंजूरी से बनी तथा फिल्मकार और बैरकपुर के विधायक राज चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित इस डॉक्यूमेंट्री में एक काल्पनिक लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावशाली कथा बुनी गई है। 

Jan 16, 2026 10:52 am ISTPramod Praveen पीटीआई, कोलकाता
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अपनी कल्याणकारी मुहिम को बढ़ावा देने के लिए सिल्वर स्क्रीन का सहारा लिया है और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रमुख योजनाओं को रोजमर्रा की जिंदगी बदलने वाले सामाजिक समताकारी उपायों के रूप में पेश करती 55 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री का अनावरण किया है। ‘लोक्खी एलो घोरे’ शीर्षक वाली इस फिल्म का प्रीमियर बुधवार रात नंदन में हुआ, जहां तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी, पार्टी के सांसद और मंत्री तथा तमिलनाडु फिल्म उद्योग की जानी-मानी हस्तियां मौजूद रहीं।

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पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी की परिकल्पना और मंजूरी से बनी तथा फिल्मकार और बैरकपुर के विधायक राज चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित इस डॉक्यूमेंट्री में एक काल्पनिक लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावशाली कथा बुनी गई है। कहानी ग्रामीण बंगाल की एक लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसने कम उम्र में अपने पति को खो दिया था। विधवा का किरदार अभिनेत्री सुभाश्री गांगुली ने निभाया है। उसके किसान पति की दिल का दौरा पड़ने से अचानक मौत के बाद उसकी जिंदगी बिखर जाती है। सामाजिक रीति-रिवाजों की जकड़न के साथ, विधवा को गरीबी और जड़ जमाए पितृसत्तात्मक मानदंडों के बीच अपने ही घर में अपमान का सामना करना पड़ता है।

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सरकारी योजनाओं का जिक्र

कहानी में मोड़ तब आता है जब उसे धीरे-धीरे राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगता है। घरेलू सहायता के लिए लक्ष्मी भंडार, खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य साथी, खेती सहायता के लिए कृषक बंधु, आजीविका के लिए स्वयं सहायता समूहों के ऋण, देवरानी के बाल विवाह को रोकने के लिए कन्याश्री, स्वास्थ्य सेवा के लिए स्वास्थ्य साथी और स्थायी आवास के लिए बंगालार बाड़ी। ये सरकारी पहल उस विधवा स्त्री को अपनी जिंदगी फिर से संवारने में मदद करते हैं।

केंद्र पर वित्तीय वंचना के आरोप

स्क्रीनिंग के बाद ममता बनर्जी ने कहा, “किसी भी निर्वाचित सरकार का कर्तव्य और जिम्मेदारी अपने पूरे कार्यकाल के दौरान काम करना होता है। यह डॉक्यूमेंट्री सात या आठ योजनाओं को उजागर करती है लेकिन और भी कई योजनाएं हैं।” केंद्र पर वित्तीय वंचना का आरोप लगाते हुए बनर्जी ने कहा कि धन रोके जाने के बावजूद कई योजनाएं लागू की गईं। उन्होंने कहा, “केंद्र पर बंगाल के लगभग दो लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। केंद्र सरकार दिल्ली बंगाल को वंचित रखना चाहती थी, लेकिन हम उनकी कृपा पर नहीं टिके। हमारी सरकार ने दिखाया है कि आत्मनिर्भर बंगाल का क्या मतलब है।”

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मात्र 15 दिनों में बनी डॉक्यूमेंट्री

राज चक्रवर्ती ने कहा कि फिल्म को मात्र 15 दिनों में पूरा किया गया और बताया कि अभिषेक बनर्जी ने व्यक्तिगत रूप से पटकथा पर ध्यान दिया। यह डॉक्यूमेंट्री अब टीएमसी के चुनावी अभियान के तहत मोहल्लों और गांवों में दिखाई जाएगी।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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