Explainer: पहले उत्तराखंड फिर गुजरात, अब असम में भी UCC; तीनों राज्यों के समान नागरिक संहिता में क्या अंतर
उत्तराखंड और गुजरात के UCC कानूनों में जहां बहुबविवाह पर पूरी तरह से रोक लगाई गई है और इसके उल्लंघन को सिविल अपराध माना गया है, वहीं असम में बहुविवाह को एक आपराधिक कृत्य माना गया है।

असम सरकार ने सोमवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर एक विधेयक विधानसभा में पेश किया जिसमें बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का प्रावधान है। विधेयक में हालांकि कहा गया है कि यह असम में निवास करने वाली किसी भी अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा। राज्य के संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से विधानसभा में 'असम के लिए समान नागरिक संहिता, 2026 विधेयक' पेश किया।
कांग्रेस, रायजोर दल और तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने इस कदम का विरोध किया और इसे पेश करने से पहले सभी हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श की मांग की। मुख्यमंत्री सरमा ने विधेयक के 'उद्देश्य और कारणों के कथन' में कहा, ''इस विधेयक का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और सह-जीवन (लिव-इन रिलेशन) संबंध से संबंधित कानूनों को एकीकृत और सरल बनाना है।''
बहुविवाह पर प्रतिबंध
मुख्यमंत्री ने बताया कि विधेयक में विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और महिलाओं की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है और बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा, ''सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विवाहों को मौजूदा धार्मिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न करने की अनुमति देकर असम की सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करता है।'' कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए विधेयक में विवाह और तलाक के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है जो पति-पत्नी के लिए भरण-पोषण, विरासत और अन्य कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
आखिर तीनों राज्यों (उत्तराखंड, गुजरात और असम) के UCC में क्या अंतर?
इस तरह असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद ऐसा तीसरा राज्य बन गया है, जहां समान नागरिक संहिता लागू होने जा रहा है। हालांकि, तीनों ही राज्यों का मूल ढांचा एक समान है। जैसे- बहुविवाह पर रोक, विवाह-तलाक का अनिवार्य पंजीकरण और बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार, लेकिन उन्हें लागू करने के तौर-तरीकों में थोड़ी भिन्नता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर तीनों राज्यों (उत्तराखंड, गुजरात और असम) के UCC में क्या अंतर है? इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. बहुविवाह (Polygamy) पर सजा में अंतर
उत्तराखंड और गुजरात के UCC कानूनों में जहां बहुबविवाह पर पूरी तरह से रोक लगाई गई है और इसके उल्लंघन को सिविल अपराध माना गया है, वहीं असम में बहुविवाह को एक आपराधिक कृत्य माना गया है। यानी इसका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ आपराधिक न्याय प्रक्रिया के तहत 7 साल तक जेल की सजा का कड़ा प्रावधान किया गया है।
2. बाल विवाह और 'लव जिहाद' पर कड़ाई
असम में पेश किए गए UCC बिल में बाल विवाह के खिलाफ सख्त प्रावधान हैं। इसके अलावा, असम के UCC बिल में नाबालिगों को निशाना बनाने वाले 'लव जिहाद' जैसे मामलों और जबरन विवाह के खिलाफ सख्त कानूनी सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है जो उत्तराखंड और गुजरात के मूल ड्राफ्ट से कहीं अधिक आक्रामक है।
3. जनजातीय समूहों को छूट
वैसे तो तीनों ही राज्यों में जनजातीय समूहों को UCC कानून से छूट दिया गया है लेकिन जहां उत्तराखंड और गुजरात में जनजातीय समूह राज्य की कुल आबादी का छोटा हिस्सा है, वहीं पूर्वोत्तर का राज्य होने की वजह से असम में कुल आबादी के एक बड़े हिस्से को इससे छूट मिली हुई है क्योंकि वहां इसकी आबादी करीब 12.44 फीसदी है, जिन पर ये बिल भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत लागू नहीं होते। उनकी पारंपरिक संस्कृति और रीति-रिवाजों पर कोई आंच न आए, इसलिए उन्हें इससे बाहर रखा गया है।
4. लिव-इन रिलेशनशिप के नियम और सजा
उत्तराखंड और गुजरात के UCC बिल में लिव-इन पार्टनरशिप का वेब पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य है। उत्तराखंड में पंजीकरण न कराने पर 3 महीने तक की जेल या जुर्माना हो सकता है। गुजरात में भी इसी पैटर्न को अपनाते हुए कड़े जुर्माने और सजा तय की है लेकिन असम में लिव-इन रिलेशनशिप का एक महीने के भीतर पंजीकरण नहीं कराने पर या इसका उल्लंघन करने पर न्यायिक और प्रक्रियात्मक कार्यवाही को स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाया गया है ताकि सुरक्षा और निजता का संतुलन बना रहे।
5. कब कहां लागू?
उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है जिसने समान नागरिक संहिता को लागू किया है। उत्तराखंड में यह जनवरी 2015 से लागू है, जबकि, गुजरात में यह बिल मार्च 20226 में पारित किया गया। असम में यह बिल आज यानी 25 मई 2026 को विधानसभा में अभी पेश ही हुआ है।
इस खबर पर आपकी क्या राय है?
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


