‘पंडाल के पीछे नॉन-वेज खाने वाले पाखंडी’! बाबा बागेश्वर ने कहा 'कर दो बैन', BJP के अंदर भी उठे सवाल
कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री ने दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा प्रतिमा के आसपास मांसाहारी भोजन न बेचने की अपील की। इसके साथ ही, उन्होंने बंगाल के हिंदुओं से नवरात्रि मनाने का भी आह्वान किया। इससे राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है।

जन्माष्टमी के अवसर पर हनुमान कथा सुनाने के लिए बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तीन दिनों के लिए पश्चिम बंगाल के लिलुआ आए थे। बंगाल की अपनी इस यात्रा के दौरान, बागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने दुर्गा पूजा को लेकर कुछ ऐसा कहा जिसने राज्य में सियासी हलचल बढ़ा दी है। एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या राज्य में दुर्गा पूजा के दौरान मांस-मछली खाने पर रोक लगेगी। क्योंकि हाल ही में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में भी यह मुख्य मुद्दा बनकर उभरा था।
कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री ने दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा प्रतिमा के आसपास मांसाहारी भोजन न बेचने की अपील की। इसके साथ ही, उन्होंने बंगाल के हिंदुओं से नवरात्रि मनाने का भी आह्वान किया। इससे राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है। धीरेंद्र का कहना है कि दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन करने वाले ‘विधर्मी’ हैं। इसी कारण उन्होंने मांसाहारी भोजन छोड़ने का कारण बताया है।
धीरेंद्र शास्त्री ने क्या कहा?
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने हावड़ा में आयोजित हनुमंत कथा के दौरान कहा कि दुर्गापूजा पंडालों के पीछे या देवी प्रतिमाओं के आसपास नॉन-वेज खाना बनना या बिकना उन्हें पसंद नहीं है। उन्होंने बंगाल के हिंदुओं से नवरात्रि के नियमों का पालन करने, प्रतिमाओं के पास नॉनवेज खाना न बेचने और ऐसा करने वाले लोगों के बहिष्कार की अपील की।
उन्होंने दुर्गापूजा के समय मांस-मछली खाने वालों को “पाखंडी” तक कहा, जिससे विवाद और तेज हो गया।
बंगाल में मांस मछली का मुद्दा संवेदनशील क्यों है?
पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव है। बंगाली समाज के एक बड़े हिस्से में दुर्गापूजा के दौरान, खासकर नवमी के दिन, मांसाहारी भोजन- मछली और मटन को सामान्य सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। हालांकि हर परिवार, समुदाय और पूजा समिति की प्रथा अलग हो सकती है।
इसलिए शास्त्री की अपील को कई लोगों ने धार्मिक शुचिता की व्यक्तिगत राय से आगे बढ़कर बंगाली परंपरा पर टिप्पणी के रूप में देखा। विवाद का केंद्र यह है कि क्या पंडाल या प्रतिमा के बिल्कुल पास मांसाहारी भोजन की बिक्री होनी चाहिए, या फिर किसी धार्मिक व्यक्ति को पूरे समुदाय के खानपान के बारे में निर्देश देने का अधिकार है।
धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया
सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया भाजपा के भीतर से आई। पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने शास्त्री की अपील का समर्थन नहीं किया और कहा कि कोई साधु-संत यह तय नहीं कर सकता कि बंगाली दुर्गा पूजा में क्या खाएंगे। उन्होंने कहा कि अष्टमी पर लूची और नवमी पर पांठे का मांस खाने की स्थानीय परंपरा है।
वहीं टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा, "मुझे बाबा बागेश्वर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। वे मध्य प्रदेश के एक मंदिर के प्रमुख हैं। मैं उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता। लेकिन अगर कोई बाहरी व्यक्ति आकर सब कुछ तय करे, तो बंगाल की जनता की स्वतंत्रता का क्या होगा? लोग समिति के मन मुताबिक पूजा-अर्चना करेंगे। वे नियमों का पालन करेंगे। इसमें बाबा बागेश्वर का क्या लेना-देना है?"
इस प्रतिक्रिया से साफ है कि विवाद केवल भाजपा बनाम विरोधी दलों तक सीमित नहीं रहा। बंगाल की राजनीति में दुर्गापूजा, भोजन और क्षेत्रीय पहचान बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं, इसलिए किसी भी “शाकाहारी बनाम मांसाहारी” बहस को सांस्कृतिक दखल के रूप में पेश किए जाने की संभावना रहती है। कुछ ऐसा ही हमें विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था।
विधानसभा चुनाव में भी उठा था मांस-मछली का मुद्दा
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों में मांस-मछली (खासकर मछली) एक प्रतीकात्मक लेकिन बहुत तेज राजनीतिक मुद्दा बन गया था। यह सीधे कानून का मुद्दा नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, आस्था और “बंगालियत” के इर्द-गिर्द बना नैरेटिव था, जिसे टीएमसी और बीजेपी ने अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया।
दरअसल ममता बनर्जी ने कई रैलियों में कहा कि अगर बीजेपी सत्ता में आएगी तो बंगालियों को मछली, मांस और अंडा खाने से रोका जाएगा। उन्होंने इसे “बंगाल के रहन-सहन पर खतरा” बताकर पेश किया।
बीजेपी ने इसे “झूठा प्रचार” और “मेनू-कार्ड की राजनीति” करार दिया। पार्टी नेताओं ने कहा कि मछली-मांस पर कोई बैन नहीं होगा। उनका विरोध सिर्फ गोमांस की खुली बिक्री से है।
देखते ही देखते चुनाव प्रचार में मछली सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि बंगाली अस्मिता का प्रतीक बन गई। टीएमसी ने इसे ‘हमारी संस्कृति बनाम बाहरी दखल’ के फ्रेम में पेश किया, जबकि बीजेपी ने ‘हम भी बंगाली हैं, हम भी नॉन-वेज खाते हैं’ दिखाने की कोशिश की।
टीएमसी ने प्रचार सामग्री, भाषणों और सोशल मीडिया में माछ-भात को बंगालियत का केंद्र बनाया। जवाब में बीजेपी ने अपना विरोध गोमांस की बिक्री तक सीमित बताया और कहा कि अन्य मांस/मछली पर कोई पाबंदी का प्रस्ताव नहीं है।
TMC ने इस पूरे मुद्दे को चुनाव प्रचार के दौरान इतना उठाया कि बीजेपी के नेताओं को बंगाल जाकर माछ-भात खाने की अपनी तस्वीरें शेयर करनी पड़ीं।
अनुराग ठाकुर जैसे स्टार प्रचारकों ने कैमरे के सामने मछली-भात खाया, ताकि ‘हम भी बंगाली’ का संदेश जाए। मनोजी तिवारी ने भी माथ-भात खाया।
चंपई सोरेन और अन्य नेताओं ने भी माछ-भात का आनंद लेते हुए फोटो वीडियो शेयर किए। असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा ने ममता को फिश-ईटिंग कॉन्टेस्ट की चुनौती तक दे डाली।


