
पत्नी नहीं आज्ञाकारी नौकरानी चाहिए थी… हाईकोर्ट ने खारिज कर दी पति की याचिका, क्या है पूरा मामला?
संक्षेप: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक दंपति के झगड़े के मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि शादी ब्याह बच्चों का खेल नहीं है। अदालत ने इस दौरान पति की ओर से दायर तलाक की अर्जी को खारिज करते हुए अहम टिप्पणियां भी की हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक शख्स द्वारा दायर की गई तलाक की अर्जी खारिज दी है। यह शख्स बेंगलुरु के एक अदालत के फैसले के खिलाफ अपील लेकर HC पहुंचा था। फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि शख्स को पत्नी की बजाय एक "आज्ञाकारी नौकरानी" चाहिए थी। अदालत ने यह भी कहा कि शादी बच्चों का खेल नहीं होता और एक शादी में दोनों पति-पत्नी को सामान्य जीवन जीने के लिए समझौता करना ही पड़ता है।

इससे पहले बेंगलुरु की अदालत ने पति की तलाक याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि पत्नी ने साबित किया है कि पति और उसका परिवार महिला की ओर से मन माफिक दहेज ना मिलने की वजह से असंतुष्ट थे। जानकारी के मुताबिक जोड़े की शादी 2015 में हुई थी। हालांकि वे केवल 10 दिन ही साथ रहे।
पति की दलील
अदालत में अर्जी लगाते हुए पति ने कहा कि उसकी पत्नी शादी के बाद अपनी नौकरी के लिए सिंगापुर चली गई, जबकि वह अमेरिका में काम करता था। कथित तौर पर उसकी पत्नी ने शादी के बाद अमेरिका में उसके साथ रहने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उस व्यक्ति ने 2016 में फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी।
महिला का क्या पक्ष?
वहीं महिला ने हाईकोर्ट से कहा कि उसके पति और उसकी मां दहेज के मिले पैसों से नाखुश थे। महिला ने आगे कहा कि उस शख्स ने अमेरिका जाने के लिए उसके वीजा का कभी इंतजाम ही नहीं किया। उसने यह भी दावा किया कि उसकी सास दोनों के बीच लगातार हस्तक्षेप करती थी, जिससे शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन जीना असंभव हो गया।
शादी बच्चों का खेल नहीं- HC
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस उमेश अडिगा की पीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा, "शादी बच्चों का खेल नहीं है। वैवाहिक जीवन में, पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे के साथ समझौता और एडजस्टमेंट करना पड़ता है, ताकि एक सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकें।" कोर्ट ने आगे कहा, "यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को पत्नी की बजाय एक आज्ञाकारी नौकरानी की जरूरत थी। ऐसा लगता है कि वह अपनी जीवन-साथी से बहुत ज्यादा उम्मीद कर रहा है कि वह हर काम उसकी मर्जी और पसंद के अनुसार करे।”
पीठ ने यह भी कहा कि पति ने मामूली मुद्दे को बड़ा बना दिया, जिन्हें आपसी बातचीत और समझ से सुलझाया जा सकता था। हाईकोर्ट ने कहा कि पति की छोटी-मोटी बातों पर समझौता ना करने और उन्हें सुलझाने की कोशिश ना करना ही रिश्ते के टूटने का कारण बनी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामूली मुद्दे को तलाक के लिए क्रूरता का कारण नहीं दे सकते।





