चुनावी नतीजों में तब तक दखल नहीं, जब तक कि…CJI की पीठ ने वोटरों की स्थिति पर जताई एक बड़ी चिंता
जस्टिस बागची ने कहा कि अगर 10 फीसदी लोग वोट नहीं डालते हैं और जीत का अंतर 10% से ज़्यादा है, तो चिंता की बात नहीं है लेकिन अगर यह अंतर 5 फीसदी से कम है, तो हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (13 अप्रैल) को दो टूक कहा कि पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों के नतीजों पर तब तक अदालत कोई दखल नहीं देगी, जब तक की हार-जीत का अंतर मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान बाहर किए गए लोगों की संख्या से कम न हो। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इसके साथ ही यह भी कहा कि बंगाल के मतदाता दो संस्थाओं के बीच पिस रहे हैं। CJI सूर्यकांत के साथ पीठ में बैठे जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता अब अलग-अलग संवैधानिक संस्थाओं के बीच पिस रहे हैं।
जस्टिस बागची ने यह टिप्पणी तब की जब चुनाव आयोग ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारियों ने तार्किक विसंगति के 47 फीसदी मामलों को खारिज कर दिया है; ये वे अधिकारी थे जिन्होंने चुनाव आयोग द्वारा जारी नोटिसों पर फैसला सुनाया था। कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि चुनाव आयोग ने ही पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान संदिग्ध मतदाताओं की एक "तार्किक विसंगति" सूची बनाई थी।
दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच फंसा है वोटर
बार एंड बेंच के मुताबिक, जस्टिस बागची ने कहा, “यहाँ बात यह नहीं है कि लक्ष्य साधने के लिए कोई भी तरीका सही है, बल्कि यह है कि सही तरीके से ही लक्ष्य साधा जाना चाहिए। यह राज्य और चुनाव आयोग के बीच की लड़ाई नहीं है। यह एक-दूसरे पर दोष मढ़ने का खेल नहीं है। यह तो उस मतदाता की स्थिति के बारे में है जो दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच फंसा हुआ है। अदालतों ने केवल चुनावों को बढ़ावा देने के लिए हस्तक्षेप किया है, न कि उन्हें रोकने के लिए।”
तब तक चुनाव नतीजों में दखल नहीं…
इसी बीच, जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि तब तक चुनाव नतीजों में दखल नहीं दिया जा सकता, जब तक की हार का अंतर SIR में बाहर किए गए मतदाताओं की संख्या से ज्यादा न हो। उन्होंने आगे कहा, “अगर 10 फीसदी लोग वोट नहीं डालते हैं और जीत का अंतर 10% से ज़्यादा है, तो चिंता की बात नहीं है लेकिन अगर यह अंतर 5 फीसदी से कम है, तो हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। पहले अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष किसी उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाती थी, क्योंकि किसी भी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।”
यह न सोचें कि हमारे मन में यह सवाल नहीं है
जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग से यह भी कहा, "कृपया यह न सोचें कि हमारे मन में यह सवाल नहीं है कि उन लोगों का क्या होगा जिन्हें मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।" जस्टिस बागची ने पश्चिम बंगाल और बिहार में हुए SIR (विशेष गहन संशोधन) के बीच के अंतरों को भी रेखांकित किया, विशेष रूप से 'तार्किक विसंगति सूची' तैयार करने के मामले में। उन्होंने कहा, "हमने संवैधानिक संस्था को मतदाता सूची की शुद्धता के मुद्दे की जांच करने की अनुमति दी है। SIR पर आपकी मूल ECI अधिसूचना में 2002 की सूची का जिक्र नहीं था। लेकिन आपकी तार्किक विसंगति सूची को खारिज करने के कारणों में 2002 की सूची वगैरह शामिल हैं। आपकी अधिसूचना उन लोगों पर लागू हुई जो 2002 की सूची में शामिल लोगों से संबंधित हैं। 2002 की सूची ही पैमाना है। देखिए, अपनी अंतिम सूची में आपने 2002 की सूची के सदस्यों को हटाया नहीं है। जब बिहार SIR पर बहस हुई थी, तो ECI का पक्ष बिल्कुल स्पष्ट था कि 2002 की सूची के सदस्यों को कोई दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं है। कृपया बिहार मामले में अपना लिखित पक्ष देखें। आपने कहा था कि 2002 के मतदाताओं को दस्तावेज़ देने की जरूरत नहीं है।"
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लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


