महाराष्ट्र ही नहीं, दिल्ली में भी गिरेगी गाज! उद्धव की शिवसेना में दोबारा टूट के खतरे से हिला विपक्ष

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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उद्धव ठाकरे गुट के 7 सांसद और 16 विधायक पाला बदल सकते हैं। राउत ने सांसदों को 15 करोड़ रुपये के ऑफर का गंभीर आरोप लगाया है। जानिए इस संभावित टूट का दिल्ली की राजनीति और विपक्षी 'INDIA' गठबंधन पर क्या असर होगा ।

महाराष्ट्र ही नहीं, दिल्ली में भी गिरेगी गाज! उद्धव की शिवसेना में दोबारा टूट के खतरे से हिला विपक्ष

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के सामने एक नया और गहरा संकट खड़ा होता दिख रहा है। पार्टी के भीतर एक और टूट की आशंकाएं तेज हो गई हैं। अगर यह विभाजन होता है, तो इसका असर सिर्फ महाराष्ट्र की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली की राजनीति और विपक्षी दलों के 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन को इसका कहीं ज्यादा भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

अटकलें तेज हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के 6 से 7 लोकसभा सांसद और 14 से 16 विधायक पार्टी का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। यह घटनाक्रम ऐसे वक्त में सामने आ रहा है जब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) पहले से ही झटके झेल रहा है।

इस बार विधानसभा नहीं, संसद है लड़ाई का केंद्र

साल 2022 में एकनाथ शिंदे की अगुवाई में हुई बगावत महाराष्ट्र विधानसभा तक सीमित थी, जब पार्टी के 55 में से 40 विधायकों ने पाला बदल लिया था और महा विकास अघाड़ी (MVA) की सरकार गिर गई थी। लेकिन वर्तमान संकट लोकसभा के इर्द-गिर्द बुना जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ठाकरे गुट के कम से कम 6 सांसद एक अलग समूह के रूप में मान्यता मांगने के लिए लोकसभा अध्यक्ष से संपर्क करने पर विचार कर रहे हैं। वहीं, कुछ अन्य रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि 7 सांसद शिंदे गुट के सीधे संपर्क में हैं। दल-बदल कानून के अनुसार अयोग्यता की कार्रवाई से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का एक साथ आना जरूरी है। चूंकि शिवसेना (यूबीटी) के पास फिलहाल 9 सांसद हैं, इसलिए यह जादुई आंकड़ा 7 सांसदों का बैठता है। यही वजह है कि 6-7 सांसदों के टूटने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा है।

सांसदों की 'गायब' होने की अटकलें और 15 करोड़ का आरोप

बगावत की इन सुगबुगाहटों ने तब जोर पकड़ा जब उद्धव ठाकरे द्वारा हालात की समीक्षा के लिए बुलाई गई बैठक में कई सांसद कथित तौर पर पहुंच से बाहर रहे। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि बैठक में सिर्फ 4 सांसद उपस्थित थे। हालांकि, पार्टी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि सभी 9 सांसदों ने व्यक्तिगत या वर्चुअली रूप से बैठक में हिस्सा लिया है और पार्टी में किसी भी तरह की बगावत नहीं है। इसी बीच, संजय राउत ने एक गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सांसदों को अपनी तरफ खींचने के लिए 15 करोड़ रुपये के प्रलोभन दिए जा रहे हैं, हालांकि इस दावे की अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है।

'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के लिए खतरे की घंटी

यदि शिवसेना (यूबीटी) में टूट होती है, तो यह सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं होगी। यह ऐसे समय में हो रहा है जब विपक्ष का 'इंडिया' ब्लॉक कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। हाल ही में डीएमके (DMK) ने गठबंधन की बैठकों से दूरी बनाते हुए खुद को 'इंडिया' ब्लॉक से अलग कर लिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) भारी अंदरूनी कलह से जूझ रही है, जहां कई सांसदों ने टूटकर एक नया राजनीतिक मंच तैयार कर लिया है। आम आदमी पार्टी (AAP) भी अब गठबंधन के घटक के रूप में काम करने के बजाय अपना स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता चुन रही है।

इन परिस्थितियों में शिवसेना (यूबीटी) का कमजोर होना विपक्षी खेमे की संसदीय ताकत को सीधा नुकसान पहुंचाएगा। इसके अलावा कांग्रेस, जो पहले ही नेतृत्व और समन्वय को लेकर सहयोगियों की आलोचना का सामना कर रही है, उसके लिए भी यह एक गहरी चिंता का विषय बन सकता है।

शिंदे को फायदा और उद्धव के लिए अस्तित्व की लड़ाई

एकनाथ शिंदे के लिए यूबीटी सांसदों को तोड़ना सिर्फ संख्याबल बढ़ाने का खेल नहीं है। 2022 में पार्टी के संगठन और चुनाव चिह्न (तीर-कमान) पर कब्जा करने के बाद, अगर वह सांसदों को भी अपने साथ ले आते हैं तो यह साबित हो जाएगा कि उनके गुट की ओर लोगों का आना कोई एक बार की घटना नहीं बल्कि एक निरंतर चलने वाली राजनीतिक प्रक्रिया है। इससे सत्ताधारी एनडीए (NDA) के भीतर उनका रसूख और मजबूत होगा।

दूसरी तरफ, उद्धव ठाकरे के लिए यह उनके राजनीतिक वजूद को बचाने की चुनौती है। पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न छिनने के बाद लोकसभा चुनाव में उनकी 9 सीटों की जीत उनके राजनीतिक 'सर्वाइवल' का एक बड़ा प्रतीक बनकर उभरी थी। हालांकि ठाकरे नाम का भावनात्मक जुड़ाव आज भी कई समर्थकों के साथ है, लेकिन अगर यह ताजा बगावत सफल होती है, तो चुनावी सफलता के बावजूद निर्वाचित प्रतिनिधियों को रोक कर न रख पाने की उनकी क्षमता पर बड़े और असहज सवाल खड़े हो जाएंगे।

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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