Hindi NewsIndia NewsTwo decades passed, when will you Frame rules future CJI reprimanded Centre; matter is concern for patients and Doctors
दो दशक बीत गए, कब बनाओगे नियम? भावी CJI ने केंद्र को थमाया नोटिस; मरीजों से जुड़ा है मामला

दो दशक बीत गए, कब बनाओगे नियम? भावी CJI ने केंद्र को थमाया नोटिस; मरीजों से जुड़ा है मामला

संक्षेप:

याचिका के मुताबिक, अप्रैल 2025 में फाइल की गई एक RTI एप्लीकेशन पर नेशनल मेडिकल कमीशन से जवाब मिला कि अभी तक कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई गई हैं और प्रोसेस अभी भी चल रहा है।

Tue, 2 Dec 2025 09:33 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार से एक जनहित याचिका (PIL) पर जवाब मांगा है, जिसमें कथित मेडिकल लापरवाही के मामलों में डॉक्टरों, अस्पतालों या उससे जुड़े लोगों के खिलाफ क्रिमिनल केस चलाने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क तैयार करने की मांग की गई है। समीक्षा फाउंडेशन- मेडिकल लापरवाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध बनाम भारत सरकार और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए भावी CJI जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उस याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया था कि जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी साफ निर्देशों के बावजूद, न तो केंद्र और न ही किसी राज्य सरकार ने दो दशक बाद भी जरूरी कानूनी नियम या प्रभावी दिशा निर्देश बनाए हैं।

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NGO समीक्षा फाउंडेशन की तरफ से फाइल की गई याचिका में कहा गया है कि 2005 के फैसले में सरकार को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (अब नेशनल मेडिकल कमीशन) से सलाह करने के बाद गाइडलाइंस बनाने का आदेश दिया गया था, ताकि यह पक्का किया जा सके कि डॉक्टरों पर बिना किसी इंडिपेंडेंट मेडिकल राय के मुकदमा न चले और रेगुलर गिरफ्तारियां न हों।

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अभी तक कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई गई

याचिका के मुताबिक, अप्रैल 2025 में फाइल की गई एक RTI एप्लीकेशन पर नेशनल मेडिकल कमीशन से जवाब मिला कि अभी तक कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई गई हैं और प्रोसेस अभी भी चल रहा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह रवैया कोर्ट के 2005 के निर्देशों के प्रति “भयंकर उदासीनता” दिखाता है, जिससे एक खालीपन पैदा हुआ है। इससे मरीजों के पास कोई रोक-टोक नहीं है और डॉक्टरों के पास प्रोसीजरल सेफगार्ड तक नहीं हैं।

पीड़ित परिवारों का कोई सहारा नहीं

याचिका में कहा गया है कि 2005 के फैसले के मुताबिक, किसी डॉक्टर पर जल्दबाजी या लापरवाही के लिए मुकदमा चलाने से पहले, जांच अधिकारियों को पहले एक काबिल सरकारी डॉक्टर से इंडिपेंडेंट मेडिकल राय लेनी होगी। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रैक्टिस में कोई भी डॉक्टर साफ वजहों से दूसरे डॉक्टर के मामले में कोई राय देने के लिए तैयार नहीं होता। पिटीशनर ने लापरवाही के मामलों में बनी जांच कमेटियों पर भी चिंता जताई है और कहा कि ऐसी ज़्यादातर कमेटियों में सिर्फ़ डॉक्टर होते हैं, जिससे नतीजे एक जैसे नहीं आते। याचिका में कहा गया है कि 'डॉक्टर डॉक्टरों को जज करते हैं' वाला सिस्टम काफ़ी नहीं है और इससे पीड़ित परिवारों के पास कोई सहारा नहीं बचता।

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संसद की स्थायी समिति कर चुकी सिफारिश

याचिका में आगे कहा गया है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर संसद की स्थायी समिति ने 2013 में ही इन अंदरूनी जांच के तरीकों पर लोगों के भरोसे में भारी कमी देखी थी और सिफारिश की थी कि मेडिकल लापरवाही की जांच में मरीज़ों के नुमाइंदों, रिटायर्ड जजों, सिविल सर्वेंट और इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट्स वाला एक बड़ा पैनल शामिल होना चाहिए। यह भी कहा गया है कि स्टैंडिंग कमिटी की सिफारिशों और सालों से पार्लियामेंट में बार-बार पूछे गए सवालों के बावजूद, क्रिमिनल लापरवाही के मामलों की जांच के तरीके में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen
भूगोल में पीएचडी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर उपाधि धारक। ईटीवी से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार पत्रकारिता करियर की शुरुआत। कई हिंदी न्यूज़ चैनलों (इंडिया न्यूज, फोकस टीवी, साधना न्यूज) की लॉन्चिंग टीम का सदस्य और बतौर प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में काम करने के बाद डिजिटल पत्रकारिता में एक दशक से लंबे समय का कार्यानुभव। जनसत्ता, एनडीटीवी के बाद संप्रति हिन्दुस्तान लाइव में कार्यरत। समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक जगत के अंदर की खबरों पर चिंतन-मंथन और लेखन समेत कुल डेढ़ दशक की पत्रकारिता में बहुआयामी भूमिका। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और संपादन। और पढ़ें
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