ट्रेकिंग ऐप के जरिए रची गई थी पहलगाम हमले की साजिश; NIA का सबसे बड़ा खुलासा
पहलगाम आतंकी हमले पर NIA की चार्जशीट में बड़े खुलासे। 26 पर्यटकों की मौत की साजिश पाकिस्तान में बैठे हैंडलर ने 7 दिन पहले ट्रेकिंग ऐप और ड्रोन के जरिए रची थी। जानें पूरी खौफनाक इनसाइड स्टोरी।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन वैली में 22 अप्रैल 2025 को हुए भीषण आतंकी हमले को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की चार्जशीट में कई अहम और चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। इस हमले में 25 पर्यटकों और एक स्थानीय पोनीवाले समेत कुल 26 लोगों की जान गई थी। मामले में मारे गए आतंकियों के मोबाइल फोन की जांच से पता चला है कि पर्यटकों को निशाना बनाने की यह खौफनाक साजिश हमले से कम से कम एक हफ्ते पहले ही रच ली गई थी। आतंकी अपने पाकिस्तानी आकाओं के साथ कॉर्डिनेशन के लिए ट्रैकिंग और पहाड़ी अभियानों (हाइकिंग) वाले ऐप का इस्तेमाल कर रहे थे।
एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों के फोन से खुला राज
NIA की जांच के मुताबिक, 28 जुलाई 2025 को श्रीनगर के पास दाचीगाम के जंगलों में 'ऑपरेशन महादेव' के दौरान तीन आतंकी मारे गए थे। इनकी पहचान फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान, हबीब ताहिर उर्फ जिबरान और हमजा अफगानी के रूप में हुई। जांच एजेंसी को इन्हीं आतंकियों के पास से दो फोन मिले, जो पाकिस्तान में खरीदे गए थे। इन फोन के डेटा एनालिसिस से आतंकियों की तस्वीरें, पाकिस्तानी हैंडलर के साथ चैट के स्क्रीनशॉट और नेविगेशन डेटा बरामद हुए।
ट्रेकिंग ऐप के जरिए रची गई बैसरन वैली हमले की साजिश
NIA की रिपोर्ट साफ करती है कि 15 अप्रैल 2025 से ही यह साजिश एक्टिव हो चुकी थी। आतंकियों के फोन से 15 और 16 अप्रैल के टाइमस्टैम्प वाले मैप के दो स्क्रीनशॉट मिले हैं, जिनमें बैसरन के आस-पास की लोकेशन दिखाई गई थी।
इस साजिश को अंजाम देने के लिए आतंकियों ने हाइकिंग और माउंटेन एक्सपीडिशन में इस्तेमाल होने वाले एक जीपीएस-आधारित मोबाइल ऐप का सहारा लिया।
इस ऐप के जरिए वे पाकिस्तानी हैंडलर साजिद जट्ट द्वारा भेजे गए कोऑर्डिनेट्स (लोकेशन) प्राप्त और ट्रैक कर रहे थे। ओजीडब्ल्यू (ओवरग्राउंड वर्कर्स) से बातचीत के लिए भी विशेष सीक्रेट ऐप्स का इस्तेमाल किया जा रहा था।
पाकिस्तान में बैठा साजिद जट्ट कर रहा था कंट्रोल
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हमले का पूरा कंट्रोल पाकिस्तान में बैठे प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके प्रॉक्सी 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' (TRF) के कमांडर अली साजिद उर्फ अली भाई (साजिद जट्ट) के हाथों में था। पाकिस्तानी नागरिक साजिद ने वहीं बैठे-बैठे एक सीक्रेट एनक्रिप्टेड कम्युनिकेशन नेटवर्क के जरिए इस पूरे ऑपरेशन को डिजाइन किया। वही आतंकियों को लोकेशन भेजने, लॉजिस्टिक (ड्रोन से हथियार गिराने), एक जगह से दूसरी जगह जाने के आदेश देने और रूट नेविगेशन का काम संभाल रहा था।
ड्रोन से हथियार, 15 लाख कैश और स्थानीय मदद
NIA की चार्जशीट में स्थानीय मददगारों की भूमिका को भी उजागर किया गया है। हमले से ठीक एक दिन पहले (21 अप्रैल को) आतंकी एक स्थानीय निवासी परवेज अहमद के 'ढोक' (पहाड़ियों में गड़रियों की मिट्टी की झोपड़ी) में रुके थे। परवेज और उसके चाचा बशीर अहमद जोठाड पर आतंकियों को खाना और पनाह देने का आरोप है।
इसके अलावा, फैसल के शव की पहचान करने वाले एक सुरक्षित गवाह (प्रोटेक्टेड विटनेस) ने बताया कि सितंबर 2024 में उसका सामना फैसल और तीन अन्य आतंकियों से हुआ था, जो पंजाबी और उर्दू बोल रहे थे।
गवाह के मुताबिक, वे साजिद जट और गोगल दारा जंगल में ड्रोन से खेप गिराने की बात कर रहे थे। आतंकियों ने गवाह को जबरन उस जगह ले जाकर एक पीले रंग का पैकेट उठवाया था, जिसमें 20 पिस्तौल, 15 लाख रुपये नकद और तिकोने आकार के बम रखे हुए थे।
आखिर आतंकियों ने बैसरन वैली को ही क्यों चुना?
जांच एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में बताया है कि बैसरन की भौगोलिक स्थिति बेहद दुर्गम और दूरदराज है। वहां सीसीटीवी कैमरों की कोई कवरेज नहीं थी, जिसकी वजह से आतंकियों को पर्यटकों को अपना निशाना बनाने में आसानी हुई। इस हाई-प्रोफाइल मामले में NIA ने गहराई से जांच करते हुए 1,100 से ज्यादा गवाहों से पूछताछ की है और दिसंबर 2025 में जम्मू की स्पेशल NIA कोर्ट में अपनी चार्जशीट दाखिल की है।
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