यह बेहद संवेदनशील मामला,हमें बहुत चिंता है; अरावली पहाड़ियों को लेकर बोले CJI सूर्यकांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अरावली पहाड़ियों और खनन को लेकर वह फिलहाल कोई आदेश पारित नहीं करेगा। कोर्ट ने कहा कि इस मा्मले में टुकड़ों में सुनवाई नहीं होगी बल्कि लगातार सुनवाई की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि उसे अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला में खनन को लेकर काफी चिंताजनक प्रतिक्रियाएं मिल रही है, जिसे देखते हुए वह फिलहाल खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विशेष पारिस्थितिकीय मुद्दे जुड़े हुए हैं और फरवरी में उसने पर्यावरण मंत्रालय तथा अन्य पक्षकारों से अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की परिभाषा तय करने के लिए एक समिति के वास्ते संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा था।
सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामले का उल्लेख किए जाने पर कहा, 'हम इस मामले की टुकड़ों में सुनवाई नहीं करेंगे। जब तक हम पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते, तब तक किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देंगे।' सुप्रीम कोर्ट ने'अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और संबंधित मुद्दे शीर्षक से स्वतः संज्ञान लेते हुए एक मामले की सुनवाई कर रहा है।
सीजेआई ने कहा, 'वहां बहुत कुछ हो रहा है। हमें जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, वे काफी चिंताजनक हैं।' पीठ ने मामले का उल्लेख करने वाले वकील से कहा कि यदि किसी खनन पट्टे को रद्द किया जाता है, तो संबंधित पक्ष उसे चुनौती दे सकता है। पीठ ने कहा, 'हम अभी खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं करेंगे। यह एक संवेदनशील मामला है।' कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी।
कोर्ट ने दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला की सुरक्षा के लिए इसकी परिभाषा को लेकर मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था। समिति ने सिफारिश की थी कि अरावली पहाड़ी उस भू-आकृति को माना जाए, जिसकी ऊंचाई निर्धारित अरावली जिलों में स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक हो, जबकि अरावली पर्वतमाला ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों का समूह होगा, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को अरावली की नयी परिभाषा को लेकर उठे विरोध का संज्ञान लेते हुए 20 नवंबर के अपने आदेश को स्थगित कर दिया था, जिसमें पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार की गई थी। कोर्ट ने सभी खनन गतिविधियों पर भी रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "गंभीर अस्पष्टताओं" को दूर करने की जरूरत है, जिनमें यह सवाल भी शामिल है कि 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी का मानदंड कहीं पर्वतमाला के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय संरक्षण से वंचित तो नहीं कर देगा। पीठ ने कहा था, 'पर्यावरणविदों के बीच भारी आक्रोश देखने को मिला है। उन्होंने नयी परिभाषा और अदालत के निर्देशों की संभावित गलत व्याख्या और अनुचित क्रियान्वयन को लेकर गहरी चिंता जताई है।'
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अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।
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