इस IAS ने 6 साल पहले दे दिया था इस्तीफा, अभी तक नहीं हुआ मंजूर; आखिर क्या है मसला?

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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2019 में कश्मीर मुद्दे पर इस्तीफा देने वाले IAS कन्नन गोपीनाथन का इस्तीफा 6 साल बाद भी मंजूर नहीं हुआ है। इससे उनके चुनाव लड़ने पर रोक लग गई है। जानें IAS के इस्तीफे के नियम, राजनीति और इस पूरे मामले की इनसाइड स्टोरी।

इस IAS ने 6 साल पहले दे दिया था इस्तीफा, अभी तक नहीं हुआ मंजूर; आखिर क्या है मसला?

उत्तर प्रदेश कैडर के 2023 बैच के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही इस समय खूब चर्चा में हैं। उन्होंने हाल ही में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। रिंकू सिंह राही ने आरोप लगाया कि लंबे समय से उन्हें कोई जिम्मेदारीपूर्ण पोस्टिंग नहीं दी जा रही थी और न ही कोई सार्थक काम सौंपा जा रहा था। रिंकू सिंह राही से इस्तीफे के बीच एक पुराना नाम फिर से चर्चा में है। हम बात कर रहे हैं कन्नन गोपीनाथन की। 2012 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने कश्मीर के लोगों को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न मिलने' के विरोध में अगस्त 2019 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। अब 6 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उनका इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ है। गोपीनाथन ने केंद्र सरकार पर उनके इस्तीफे को जानबूझकर रोकने का गंभीर आरोप लगाया है। इस देरी के कारण वह आगामी केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं।

इस्तीफे की वर्तमान स्थिति

इंडियन एक्सप्रेस ने सरकारी सूत्रों के हवाले से लिखा है कि गोपीनाथन के इस्तीफे पर अंतिम सिफारिश अभी तक कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को नहीं भेजी गई है, जो IAS अधिकारियों का कैडर-नियंत्रण प्राधिकरण है। इसका मतलब है कि उनका इस्तीफा अभी भी गृह मंत्रालय (MHA) के पास लंबित है। सूत्रों का यह भी कहना है कि किसी इस्तीफे को स्वीकार करने में इतनी लंबी देरी का कोई पिछला उदाहरण नहीं है।

राजनीति में कदम और नियमों की बाधा

गोपीनाथन पिछले साल अक्टूबर में कांग्रेस में शामिल हुए थे और कथित तौर पर पलक्कड़ विधानसभा सीट से उम्मीदवार के रूप में उनके नाम पर विचार किया जा रहा था। अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 2014 के नियम 3(1) के अनुसार, सेवारत सरकारी कर्मचारियों को किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से जुड़ने, या किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने की सख्त मनाही है। चूंकि उनका इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ है, इसलिए तकनीकी रूप से वे अभी भी एक सरकारी अधिकारी हैं और उनका राजनीतिक भविष्य अधर में लटका है।

इस स्थिति से हताश होकर गोपीनाथन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (जो DoPT के प्रभारी मंत्री भी हैं) को टैग करते हुए इसे 'शुद्ध उत्पीड़न' करार दिया। उन्होंने लिखा: 'प्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मैं बस आपका ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूं कि आपकी सरकार ने पिछले 6.5 सालों से मेरे इस्तीफे पर कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया है। न तो मुझे वेतन मिल रहा है और न ही मुझे सेवामुक्त किया जा रहा है। इस वजह से मैं अपने पेशेवर जीवन में आगे नहीं बढ़ पा रहा हूं और साथ ही, इसने मुझे केरल में चुनाव लड़ने से भी रोक दिया है। यह सरासर उत्पीड़न है, और कुछ नहीं। मैंने अपनी इस निजी समस्या को न उठाने का फैसला किया था, क्योंकि मैं इस बात से भली-भांति अवगत हूं कि आपके शासनकाल में लाखों लोग किस तरह की कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। लेकिन, इस्तीफा देने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने के मेरे अधिकार को रोकना बेहद शर्मनाक और ओछी हरकत है- भले ही मेरी राजनीतिक स्थिति कुछ भी क्यों न हो। इस ओछी हरकत को रोकिए, और अपनी सुस्त सरकार को निर्देश दीजिए कि वह मेरे इस्तीफे पर तत्काल कार्रवाई करे।'

IAS अधिकारियों के इस्तीफे की प्रक्रिया क्या है?

IAS, IPS और IFoS जैसे अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों का इस्तीफा अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियम, 1958 के नियम 5(1) और 5(1)(A) द्वारा शासित होता है।

किसे सौंपा जाता है इस्तीफा? राज्य कैडर में सेवारत अधिकारी अपना इस्तीफा राज्य के मुख्य सचिव को सौंपते हैं। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति वाले अधिकारी संबंधित मंत्रालय के सचिव को इस्तीफा देते हैं।

AGMUT कैडर: गोपीनाथन AGMUT (अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश) कैडर से थे, इसलिए उनका मामला सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के माध्यम से भेजा जाना था। DoPT के दिशा-निर्देशों के अनुसार, इस्तीफा स्पष्ट और बिना किसी शर्त के होना चाहिए।

इसके बाद क्या होता है?

राज्य सरकार यह जांचती है कि अधिकारी पर कोई बकाया, अदालती मामला या भ्रष्टाचार की जांच तो लंबित नहीं है। मंजूरी के बाद इसे केंद्र सरकार (DoPT) को भेजा जाता है। IAS के मामले में अंतिम मंजूरी DoPT मंत्री (यानी प्रधानमंत्री) देते हैं। IPS के लिए यह अधिकार गृह मंत्री और IFoS के लिए पर्यावरण मंत्री के पास होता है।

क्या सरकार इस्तीफे को अनिश्चित काल तक रोक सकती है?

इस्तीफा स्वीकार करने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं है। हालांकि, 1988 के DoPT सर्कुलर के अनुसार, जो अधिकारी काम नहीं करना चाहता उसे सेवा में बनाए रखना सरकार के हित में नहीं है। इसलिए आम तौर पर इस्तीफे स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन कुछ अपवाद हैं। जैसे- अगर अधिकारी के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक मामला चल रहा है, तो केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की सहमति के बाद ही इस्तीफा मंजूर किया जा सकता है। अगर अधिकारी ने विशेष प्रशिक्षण या फेलोशिप के लिए सरकार के साथ कोई बॉन्ड साइन किया है। उदाहरण के लिए अरविंद केजरीवाल ने 2006 में IRS से इस्तीफा दिया था, लेकिन फेलोशिप बॉन्ड के उल्लंघन के कारण आयकर विभाग ने उन पर लगभग 9 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। यदि अधिकारी किसी बहुत महत्वपूर्ण काम में लगा है और उसका विकल्प खोजने में समय लगेगा।

कन्नन गोपीनाथन के मामले में पेंच कहां फंसा?

अगस्त 2019 में इस्तीफे के बाद भी गोपीनाथन की मुश्किलें कम नहीं हुईं। 26 सितंबर 2019 को उन्हें दादरा और नगर हवेली में सचिव के पद पर तैनात कर दिया गया। इस्तीफे के दो महीने बाद, मीडिया से अनधिकृत बातचीत का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई और चार्जशीट थमा दी गई। अप्रैल 2020 में (कोविड-19 महामारी के दौरान) जब सरकार ने उन्हें वापस काम पर लौटने का आदेश दिया और उन्होंने इनकार कर दिया, तो उनके खिलाफ महामारी रोग अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत FIR दर्ज की गई।

क्या अधिकारी अपना इस्तीफा वापस ले सकते हैं?

गोपीनाथन की तरह ही 2010 बैच के IAS अधिकारी शाह फैसल ने भी कश्मीर में 'लगातार हो रही हत्याओं' का हवाला देते हुए जनवरी 2019 में इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई, लेकिन राजनीति में असफल होने के बाद 2022 में अपना इस्तीफा वापस ले लिया और सेवा में लौट आए।

नियम क्या कहता है? नियम कहते हैं कि राजनीति शुरू करने के लिए इस्तीफा देने वाले को वापसी की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। साथ ही, इस्तीफा और वापसी के बीच अधिकतम 90 दिनों का अंतर होना चाहिए।

फैसल को वापसी कैसे मिली? फैसल के मामले में ये नियम लागू नहीं हुए क्योंकि उनका इस्तीफा कभी स्वीकार ही नहीं किया गया था। नियम यह भी कहता है कि यदि इस्तीफा स्वीकार होने से पहले लिखित में वापस ले लिया जाता है, तो उसे स्वतः वापस लिया हुआ मान लिया जाएगा। जहां शाह फैसल सिस्टम में वापस आ गए, वहीं गोपीनाथन का मामला बिल्कुल विपरीत दिशा में चला गया और वे पिछले 6 सालों से सरकारी फाइलों में उलझे हुए हैं।

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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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