जिहादी संगठनों की कमान संभाल रहीं महिलाएं, आतंकवाद की दुनिया में बदलाव कितना खतरनाक?
जिहादी गतिविधियों में अभी तक महिलाओं की भूमिका बहुत सीमित मानी जाती रही है। अधिक से अधिक वह आत्मघाती हमलावरों की भूमिका निभाती रही हैं। लेकिन हाल-फिलहाल इस ट्रेंड में बदलाव आया है।

जिहादी गतिविधियों में अभी तक महिलाओं की भूमिका बहुत सीमित मानी जाती रही है। अधिक से अधिक वह आत्मघाती हमलावरों की भूमिका निभाती रही हैं। लेकिन हाल-फिलहाल इस ट्रेंड में बदलाव आया है। इसमें देखा जा रहा है कि आतंकी संगठन अब महिलाओं को बड़ी भूमिकाएं भी सौंप रही हैं। इसके तहत, उन्हें लीडर भी बनाया जा रहा है। इसके साथ ही साथ, महिलाओं के नेतृत्व में ब्रिगेड भी तैयार की जा रही है। अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता, सारा हरमूश ने अपनी रिसर्च में आतंकी संगठनों में हो रहे बदलाव पर बात कही है।
आ रहा है बदलाव
सारा हरमूश ने कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर शोधकर्ता के तौर पर, यह अध्ययन किया कि आतंकवादी समूह किस तरह संगठित होते हैं और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालते हैं। मैंने अमेरिकी और यूरोपीय अदालतों के रिकॉर्ड, प्रतिबंधों और इनाम से संबंधित नोटिसों के साथ-साथ जिहादी समूहों के अरबी भाषा के प्रकाशनों का अध्ययन किया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि सशस्त्र आंदोलनों के भीतर महिलाओं की भूमिकाएं किस तरह बदलती रही हैं।
सारा बताती हैं कि मैंने एक नया बदलाव देखा है, जिसके तहत जिहादी समूहों में महिलाओं के संगठनात्मक अधिकारों को तेजी से औपचारिक रूप दिया गया है। वास्तव में, महिलाएं अब ऐसी स्पष्ट रूप से निर्धारित भूमिकाएं निभा रही हैं, जिनमें वे अन्य सदस्यों को प्रशिक्षण देती हैं, उनकी भर्ती करती हैं, उनका नेतृत्व करती हैं या संगठन के लिए आवश्यक कार्यों का प्रबंधन करती हैं।
पहले केवल सुसाइड बॉम्बर
जिहादी गतिविधियों में महिलाओं को शायद ही कभी अन्य सदस्यों या संगठन के कार्यों पर औपचारिक अधिकार रखने वाले लोगों के रूप में पेश किया जाता था। इसके बजाय, ऐसे समूह महिलाओं को सुरक्षा के लिए कम खतरा मानने की धारणा का फायदा उठाते हुए, आक्रामक अभियानों में उनकी सक्रिय भूमिका को मुख्य रूप से बम ले जाने वाले व्यक्ति के रूप में देखते थे।
‘सीरियन सोशल नेशनलिस्ट पार्टी’ ने 1985 में लेबनान में आत्मघाती हमले के लिए सना मेहैदली का इस्तेमाल किया था। 1991 में ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ की धनु नामक महिला सदस्य के आत्मघाती हमले में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी मारे गये थे। वहीं, कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी ने 1990 के दशक में महिला आत्मघाती हमलावरों को तैनात करना शुरू किया था।
फिर शुरू हुआ विरोध
फिलिस्तीनी आतंकवादी संगठन हमास ने शुरू में महिलाओं को आत्मघाती हमलों में इस्तेमाल करने का विरोध किया था, लेकिन 2004 में उसने अपना रुख बदल दिया। इसके आध्यात्मिक नेता, अहमद यासीन ने इस बदलाव को सामरिक दृष्टि से समझाते हुए कहा कि हो सकता है कि कोई पुरुष लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम न हो, और इसी वजह से उन्हें एक महिला का इस्तेमाल करना पड़ा। कुछ ही वर्षों के भीतर, इराक, जॉर्डन और पाकिस्तान में जिहादी समूह भी महिला आत्मघाती हमलावरों का इस्तेमाल करने लगे थे।
लेकिन नाइजीरिया के बोको हराम ने इस प्रथा को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दिया। ‘कॉम्बैटिंग टेररिज्म सेंटर’ के शोध में अप्रैल 2011 से जून 2017 के बीच 238 आत्मघाती हमलों में 434 हमलावरों की पहचान की गई-जिनमें कम से कम 56 प्रतिशत महिलाएं थीं। इन मामलों में महिलाओं की भूमिका मुख्यतः अभियान के क्रियान्वयन तक सीमित रही। महिलाएं बम लेकर जाती थीं या लक्ष्य तक पहुंचती थीं, लेकिन उन पदों पर उनकी उपस्थिति बहुत कम दिखाई देती थी जहां लोगों का चयन किया जाता था, विचारधारा या रणनीति तैयार की जाती थी, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जाता था या संगठन का स्वयं प्रबंधन किया जाता था।
बनने लगी महिलाओं की ब्रिगेड
इस बीच, इस्लामिक स्टेट समूह कुछ महिलाओं को अधिक ठोस और वास्तविक अधिकार देने की शुरुआत कर रहा था। फरवरी 2014 में, उसने सीरिया में ‘अल-खंसा ब्रिगेड’ के गठन की घोषणा की जिसमें सभी सदस्य महिलाएं थीं। महिलाएं लंबे समय से हिंसा की घटनाओं को अंजाम देती रही हैं। लेकिन अब, उन महिलाओं की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है जो नए सदस्यों को प्रशिक्षण देती हैं, नियमों को लागू कराती हैं, वैचारिक दिशा प्रदान करती हैं और इस पूरी व्यवस्था को बनाए रखने वाले तंत्र को संचालित करती हैं।
अमेरिका ने महिला को घोषित किया वांटेड
इस बीच सीरिया में उम्म कका अल-सोमाली के नाम से सक्रिय सोमालिया में जन्मी डच नागरिक खदरा ईसा एक वांटेड महिला है। अमेरिकी विदेश विभाग ने 14 सितंबर, 2026 को उसके ठिकाने की जानकारी देने वाले को 50 लाख अमेरिकी डॉलर तक का इनाम देने की घोषणा फिर से सार्वजनिक की। इससे पहले अप्रैल 2025 में भी उसके बारे में जानकारी देने के लिए इनाम की घोषणा की गई थी। ईसा को खतीबा नुसायबा या आईएसआईएस-एनके की प्रमुख शरिया प्रशिक्षक बताया गया है। यह महिलाओं की एक लड़ाकू बटालियन है, जिसका गठन 2016 में सीरिया के रक्का में महिला लड़ाकों की भर्ती, संगठन और प्रशिक्षण के लिए किया गया था।
अमेरिका का आरोप है कि उसने हथियारों, विस्फोटकों और आत्मघाती अभियानों का प्रशिक्षण लिया था। विदेश विभाग के नोटिस में दावा किया गया है कि ईसा ने आईएसआईएस की उस चरमपंथी विचारधारा की शिक्षा दी, जो आत्मघाती अभियानों और नागरिकों की हत्या को उचित ठहराती थी। सदस्यों की भर्ती की, ऐसे आदेश दिए, जिनके परिणामस्वरूप हमले और हत्याएं हुईं। साथ ही उसने एक ऐसे समूह का नेतृत्व किया, जिसने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के जरिए शरिया कानून लागू किया।


