जो रजनीकांत और कमल हासन नहीं कर पाए, वो विजय ने कर दिखाया; बन सकते हैं असली थलापति
तमिलनाडु चुनाव रुझानों में थलापति विजय की पार्टी TVK 82 सीटों पर आगे है। जानें कैसे विजय ने वो ऐतिहासिक कमाल कर दिखाया जो रजनीकांत और कमल हासन जैसे दिग्गज नहीं कर सके। पढ़ें विजय की जीत की पूरी इनसाइड स्टोरी।
सिनेमा के रुपहले पर्दे पर 'थलापति' यानी कमांडर की भूमिकाएं निभाने वाले जोसफ विजय ने आज तमिलनाडु के सियासी कुरुक्षेत्र में अपनी असली 'कमांड' साबित कर दी है। दशकों से जिस द्रविड़ियन राजनीति का किला द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के अभेद्य कब्जे में था, वहां आज 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) की सुनामी ने 100 सीटों पर शुरुआती बढ़त के साथ एक नया इतिहास रच दिया है। यह महज एक चुनावी आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस तिलिस्म के टूटने का जयघोष है जिसे भेदने का सपना रजनीकांत और कमल हासन जैसे सिनेमाई दिग्गज भी सिर्फ देखते ही रह गए। आज तमिलनाडु की जनता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें अब सिर्फ स्क्रीन का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने वाला अपना असली 'थलापति' मिल गया है। आइए समझते हैं कि आखिर विजय ने ऐसा क्या किया जो उन्हें तमिलनाडु की राजनीति का नया 'असली थलापति' (कमांडर) बना रहा है।
दिग्गजों की विफलता: रजनी और कमल कहां चूक गए?
तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता बहुत पुराना है। एमजी रामचंद्रन (MGR) और जे. जयललिता जैसे सितारों ने इस राज्य पर राज किया। इसी सफलता को दोहराने की उम्मीद में मौजूदा दौर के दो सबसे बड़े सितारों ने राजनीति का रुख किया था।
रजनीकांत का 'संकोच': रजनीकांत की फैन फॉलोइंग भगवान जैसी है। उन्होंने 2017 में राजनीति में आने का ऐलान किया था, लेकिन सालों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अंततः स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर उन्होंने कदम पीछे खींच लिए। जनता को लगा कि उनके पास राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।
कमल हासन की 'बौद्धिक राजनीति': कमल हासन ने 2018 में 'मक्कल नीधि मय्यम' (MNM) बनाई। लेकिन उनकी राजनीति और भाषण आम जनता की समझ से थोड़े ऊपर माने गए। उनके पास जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भारी कमी थी, जिसके कारण वे कोई बड़ा चुनावी प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
विजय का मास्टरस्ट्रोक: उन्होंने क्या अलग किया?
विजय ने रजनीकांत और कमल हासन की गलतियों से बहुत कुछ सीखा। उन्होंने रातों-रात राजनीति में छलांग मारने के बजाय सालों तक एक मजबूत पिच तैयार की।
फैन क्लब्स को 'राजनीतिक कैडर' में बदलना
विजय की सबसे बड़ी जीत उनका 'विजय मक्कल इयक्कम' (VMI) है। यह सिर्फ एक फैन क्लब नहीं था। पिछले 10 सालों से विजय ने अपने फैंस को रक्तदान, मुफ्त भोजन वितरण, और आपदा राहत जैसे सामाजिक कार्यों में लगा रखा था। जब उन्होंने पार्टी बनाई, तो उन्हें कैडर खोजना नहीं पड़ा; उनके पास पहले से ही एक अनुशासित फौज तैयार थी।
युवाओं और छात्रों पर फोकस
विजय ने अपना पूरा फोकस 'फर्स्ट-टाइम वोटर्स' और युवाओं पर रखा। उन्होंने राज्य के बोर्ड एग्जाम टॉपर्स को सम्मानित करने का एक विशाल कार्यक्रम शुरू किया। उनका वह भाषण जहां उन्होंने छात्रों से "पैसे लेकर वोट न देने" की अपील की, उसने मध्यम वर्ग और अभिभावकों के बीच उनकी छवि एक गंभीर नेता की बना दी।
द्रविड़ियन राजनीति के वैक्यूम का फायदा
तमिलनाडु में बदलाव की एक सुगबुगाहट लंबे समय से थी। जयललिता के निधन के बाद AIADMK कमजोर हुई है, और DMK को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में तमिलनाडु के लोगों को एक मजबूत, युवा और भरोसेमंद 'तीसरे विकल्प' की तलाश थी, जिसे विजय ने सटीकता से भर दिया।
विचारधारा का संतुलन
कमल हासन जहां पूरी तरह से वामपंथी झुकाव वाले दिखे, वहीं विजय ने एक संतुलित रास्ता चुना। उन्होंने पेरियार, कामराज और बीआर अंबेडकर की विचारधाराओं को अपनाया, जिससे उन्होंने सामाजिक न्याय की बात भी की और एक समावेशी छवि भी बनाई।
पर्दे का 'हीरो', जमीन का 'नेता'
82 सीटों पर बढ़त इस बात का साफ संकेत है कि तमिलनाडु की जनता ने विजय को सिर्फ एक 'सिनेमा स्टार' के तौर पर नहीं, बल्कि एक 'राजनीतिक विकल्प' के तौर पर स्वीकार कर लिया है। उन्होंने अपनी रैलियों में भीड़ तो जुटाई ही, लेकिन उस भीड़ को वोटों में तब्दील करने का वह मुश्किल काम भी कर दिखाया जो अक्सर अभिनेताओं के लिए एक सपना ही रह जाता है।
राजनीति में रुझान अंतिम नतीजों में बदलेंगे या नहीं, यह तो समय बताएगा। लेकिन TVK के इस शानदार प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया है कि विजय ने अपना होमवर्क बहुत अच्छी तरह से किया है। अगर यह प्रदर्शन यूं ही बरकरार रहता है, तो इसमें कोई शक नहीं कि रूपहले पर्दे का यह सुपरस्टार अब तमिलनाडु की राजनीति का "असली थलापति" बनने के लिए पूरी तरह तैयार है।
कृपया अपने अनुभव को रेट करें
लेखक के बारे में
Amit Kumarडिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।
अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
और पढ़ें

