कृष्ण जन्मभूमि से लेकर काशी विश्वनाथ तक, देश में मंदिर-मस्जिद से जुड़े कितने विवाद
2024 में संभल जिला एक विवाद का केंद्र बन गया जब स्थानीय अदालत ने हिंदू श्रद्धालु के मुकदमे पर शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने का आदेश दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थल पर बनाई गई थी।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि धार जिले में भोजशाला-कमल मौला मस्जिद का विवादित स्थल देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है। यह मामला देश में उपासना स्थलों के धार्मिक स्वरूप से संबंधित प्रमुख कानूनी मामलों में से एक है। उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दशकों पुराने उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल मुस्लिम समुदाय को ही उस स्थल पर शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी, जबकि परिसर के भीतर हिंदुओं के पूजा करने के अधिकार को प्रतिबंधित किया गया था।
अयोध्या से जुड़े मामले में 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राम मंदिर का निर्माण हुआ। इसके अलावा कुछ अन्य समान महत्वपूर्ण मामले भी हैं। इनमें से अधिकतर मामलों में, उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला मुकदमेबाजी के दौरान दिया गया है, जो किसी स्थान के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त, 1947 को मौजूद स्थिति के अनुसार बनाए रखने की बात करता है। वर्ष 1991 के कानून के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली 6 से अधिक याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन हैं।
कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद
यह मामला मथुरा में स्थित 13.37 एकड़ के परिसर से संबंधित है, जिसमें भगवान कृष्ण का जन्मस्थान माना जाने वाला कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर और शाही ईदगाह मस्जिद शामिल हैं। जहां एक ओर हिंदू समुदाय का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में 17वीं शताब्दी के दौरान देवता के जन्मस्थान पर स्थित एक पुराने मंदिर के ऊपर किया गया था, वहीं मुस्लिम पक्ष ने उपासना स्थल अधिनियम 1991 का हवाला दिया है। देवता के अगले मित्र कहे जाने वाले हिंदू उपासकों और संगठनों की ओर से जमीन पर कब्जा पाने और मंदिर को बहाल करने के लिए दायर किए गए 18 मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित हैं। एचसी ने 1 अगस्त, 2024 को मुस्लिम पक्ष की उन अर्जियों को खारिज कर दिया, जिनमें हिंदू उपासकों के मुकदमों की वैधता को चुनौती दी गई थी। इसी आदेश में अदालत ने यह भी कहा कि ये मुकदमे परिसीमा अधिनियम, वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की ओर से वर्जित नहीं हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद
वाराणसी में एक-दूसरे से सटे दो धार्मिक स्थलों को लेकर जारी विवाद अयोध्या और मथुरा के साथ-साथ तीन सबसे चर्चित मामलों में से एक है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब के शासनकाल के दौरान ध्वस्त कर दिया गया था और उसके ऊपर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया था। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह विवाद उपासना स्थल अधिनियम के तहत वर्जित है, क्योंकि वे सदियों से लगातार मस्जिद में नमाज अदा करते आ रहे हैं।
वर्ष 2021 में पांच महिलाओं ने वाराणसी की एक अदालत में प्रार्थना करने की अनुमति मांगने के लिए मुकदमा दायर किया। बाद में किए गए सर्वेक्षण में वज़ूखाने के अंदर एक शिवलिंग मिला, जिसे मुस्लिम पक्ष एक फव्वारे की व्यवस्था का हिस्सा बताता है। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उस स्थान को संरक्षित किया जहां शिवलिंग मिला था और साथ ही यह निर्देश भी दिया कि मुस्लिम उपासकों को मस्जिद तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं डाली जानी चाहिए। इसने 2024 में वाराणसी अदालत के उस आदेश पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था जिसमें मस्जिद के अंदर व्यास जी का तहखाना में एक हिंदू पुजारी को दैनिक रूप से पूजा-अर्चना करने की इजाजत दी गई थी।
शाही जामा मस्जिद
वर्ष 2024 में संभल जिला एक विवाद का केंद्र बन गया जब एक स्थानीय अदालत ने एक हिंदू श्रद्धालु द्वारा दायर मुकदमे पर शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थल पर बनाई गई थी। हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही जामा मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल के दौरान 1526 में भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर को नष्ट करने के बाद किया गया था।
सर्वे के दूसरे दौर के दौरान प्रदर्शनकारी स्थानीय लोगों की सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई, जिसमें 4 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए। मुस्लिम पक्ष ने इस आधार पर सर्वेक्षण का विरोध किया कि इसे मस्जिद समिति की उचित सुनवाई किए बिना जल्दबाजी में कराया गया था। उसने उपासना स्थल अधिनियम के उल्लंघन का भी आरोप लगाया। बाद में उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से सर्वेक्षण कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार किए जाने को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।
कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद
हिंदू और जैन श्रद्धालुओं ने 2021 में दिल्ली की एक दीवानी अदालत में कुतुब मीनार परिसर के अंदर हिंदू और जैन देवी-देवताओं की पुनर्स्थापना के लिए एक मुकदमा दायर किया। इसमें दावा किया गया कि मोहम्मद गौरी की सेना के एक जनरल कुतुबदीन ऐबक की ओर से 27 मंदिरों को आंशिक रूप से ध्वस्त कर दिया गया था और उसी सामग्री का फिर से उपयोग करके परिसर के अंदर कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किया गया था। एएसआई ने कहा कि मस्जिद कुतुब परिसर के अंदर स्थित है, जो एक संरक्षित स्मारक है। वर्तमान में वहां किसी भी प्रकार की धार्मिक पूजा की अनुमति नहीं है। वर्ष 2021 में अदालत ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि अतीत में हुई गलतियां वर्तमान और भविष्य में शांति भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं। अपीलीय अदालत में अपील लंबित है।
ईदगाह मैदान
स्थानीय अधिकारियों ने 2022 में कर्नाटक के हुबली ईदगाह मैदान में गणेश चतुर्थी समारोह की अनुमति दी, जिसका अंजुमन-ए-इस्लाम ने विरोध किया था। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारवाड़ नगर आयुक्त के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि संपत्ति धारवाड़ नगरपालिका की है और अंजुमन-ए-इस्लाम केवल 999 वर्षों की अवधि के लिए 1 रुपये प्रति वर्ष के शुल्क पर पट्टेदार है। अंजुमन-ए-इस्लाम ने दावा किया कि मैदान उपासना स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित है, वहीं उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह एक धार्मिक पूजा स्थल नहीं है। इस पर केवल बकरीद और रमजान के दौरान प्रार्थना के लिए इजाजत दी गई है।
मलाली मस्जिद
मलाली मस्जिद 2022 में तब सुर्खियों में आई जब वहां जीर्णोद्धार कार्य के दौरान मस्जिद की संरचना में हिंदू शैली की स्थापत्य कला की विशेषताएं सामने आईं। कुछ हिंदू पक्षों ने मंगलुरु की एक स्थानीय अदालत में संरचना का सर्वेक्षण कराने का अनुरोध करते हुए याचिका दायर की।
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लेखक के बारे में
Niteesh Kumarपत्रकार नीतीश कुमार 8 साल से अधिक समय से मीडिया इंडस्ट्री में एक्टिव हैं। जनसत्ता डिजिटल से बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर शुरुआत हुई। लाइव हिन्दुस्तान से जुड़ने से पहले टीवी9 भारतवर्ष और दैनिक भास्कर डिजिटल में भी काम कर चुके हैं। पत्रकार नीतीश कुमार को खबरें लिखने के साथ ग्राउंड रिपोर्टिंग का शौक है। लाइव हिन्दुस्तान यूट्यूब चैनल के लिए लोकसभा चुनाव 2024, दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 और बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की कवरेज कर चुके हैं। फिलहाल लाइव हिन्दुस्तान के लिए नेशनल और इंटरनेशनल सेक्शन की खबरें लिखते हैं। पत्रकार नीतीश कुमार को ब्रेकिंग न्यूज लिखने के साथ खबरों का गहराई से विश्लेषण करना पसंद है। राजनीति से जुड़ी खबरों पर मजबूत पकड़ और समझ रखते हैं। समसामयिक राजनीतिक मुद्दों पर कई सारे लंबे लेख लिख चुके हैं। पत्रकार नीतीश कुमार ने पत्रकारिता का पढ़ाई IIMC, दिल्ली (2016-17 बैच) से हुई। इससे पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी के महाराजा अग्रसेन कॉलेज से पत्रकारिता में ग्रेजुएशन किया। पत्रकार नीतीश कुमार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के रहने वाले हैं। राजनीति, खेल के साथ सिनेमा में भी दिलचस्पी रखते हैं। फिल्में देखना और रिव्यू करना व उन पर चर्चा करना हॉबी है।
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