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तेजस्वी यादव के सामने करारी हार ने खड़ी की बड़ी चुनौती, बिहार में अब कैसे उभरेगी RJD

तेजस्वी यादव के सामने करारी हार ने खड़ी की बड़ी चुनौती, बिहार में अब कैसे उभरेगी RJD

संक्षेप: लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को परिवार और पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। चुनाव अभियान की शुरुआत में ही परिवार के भीतर विवाद उभर आया और बड़े भाई तेज प्रताप यादव ने अलग पार्टी बना ली।

Sat, 15 Nov 2025 09:34 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी की भारी हार ने पार्टी नेता तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राघोपुर से तेजस्वी यादव खुद भी कई राउंड की कड़ी टक्कर के बाद जीत दर्ज कर सके, जबकि पार्टी की सीटें घटकर केवल 25 पर सिमट गईं। इस लड़ाई ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आपको बता दूं कि विधानसभा चुनाव से पहले तेजस्वी यादव को अपने परिवार में भी आपसी लड़ाई का सामना करना पड़ा था।

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2020 में तेजस्वी ‘परिवर्तन का चेहरा’ बनकर उभरे थे। 10 लाख सरकारी नौकरियों का उनका वादा चुनावी माहौल पर पूरी तरह हावी था और इसका परिणाम यह हुआ कि आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। लेकिन इस बार 'हर परिवार को एक सरकारी नौकरी' का उनका वादा युवाओं ने खोखला माना, खासकर तब जब नौकरी और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर सड़क पर उतरे युवाओं के बीच तेजस्वी कई मौकों पर नदारद रहे।

परिवार में दरार और शुरुआती झटका

लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को परिवार और पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। चुनाव अभियान की शुरुआत में ही परिवार के भीतर विवाद उभर आया और बड़े भाई तेज प्रताप यादव ने अलग पार्टी बना ली। इससे आरजेडी को शुरुआती चरण में ही नुकसान झेलना पड़ा।

नीतीश कुमार की एनडीए रणनीति का मुख्य आधार महिलाएं थीं, वहीं आरजेडी इस वर्ग को आकर्षित करने में असफल रही। तेजस्वी की रैलियों में महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य रही। इसके विपरीत, नीतीश कुमार की रैलियों में करीब 60% भीड़ महिलाओं की थी। एनडीए ने महिलाओं को चुनाव पूर्व 10,000 नकद सहायता की घोषणा का प्रभावी प्रचार किया। तेजस्वी ने इसका जवाब 30,000 देने की घोषणा से देने की कोशिश की, पर यह देर से और अप्रभावी साबित हुई।

अंतिम समय में सामाजिक समीकरण बनाने का प्रयास भी असफल रहा। सीट बंटवारे को लेकर स्थिति आखिरी दिन तक स्पष्ट नहीं हो सकी और 10 सीटों पर INDIA गठबंधन के दल ही एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते दिखे। आरजेडी ने वीआईपी (मुकेश सहनी) और आईआईपी (आईपी गुप्ता) को शामिल किया। सहनी को डिप्टी सीएम चेहरा घोषित करने के बावजूद निषाद समुदाय उनसे दूर रहा। वीआईपी एक भी सीट नहीं जीत सकी। कांग्रेस 61 में से केवल 6 सीटों पर जीती। मुस्लिम-यादव (MY) वोटों में भी सेंध दिखी। सीमांचल में AIMIM ने बेहतर प्रदर्शन किया और कई महत्वपूर्ण सीटें हाथ से निकल गईं।

6 अक्टूबर को चुनाव की घोषणा के बाद तेजस्वी ने 7 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस की, लेकिन 22 अक्टूबर तक प्रचार से दूर रहे। 22 अक्टूबर तक बनी यह ‘गायब रहने’ की छवि उनके खिलाफ गई। 23 अक्टूबर को INDIA गठबंधन द्वारा उन्हें सीएम फेस घोषित करने के बाद उन्होंने एक दिन में 15 से अधिक रैलियों के जरिए गति पकड़ने की कोशिश की, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार तब तक बहुमूल्य समय हाथ से निकल चुका था।

‘जंगल राज’ नैरेटिव का जवाब देने में असफलता

एनडीए ने आरजेडी के खिलाफ 21 साल से चले आ रहे ‘जंगल राज’ के नैरेटिव को और मजबूत किया। तेजस्वी इसे प्रभावी ढंग से काट नहीं सके।

Himanshu Jha

लेखक के बारे में

Himanshu Jha
कंप्यूटर साइंस में पोस्ट ग्रैजुएट हिमांशु शेखर झा करीब 9 वर्षों से बतौर डिजिटल मीडिया पत्रकार अपनी सेवा दे रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा राष्ट्रीय राजनीति पर अच्छी पकड़ है। दिसंबर 2019 में लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े। इससे पहले दैनिक भास्कर, न्यूज-18 और जी न्यूज जैसे मीडिया हाउस में भी काम कर चुके हैं। हिमांशु बिहार के दरभंगा जिला के निवासी हैं। और पढ़ें
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