14 सालों में किसी CM ने नहीं किया जो काम, वो करने जा रहे थलपति विजय, क्यों उठ रहे सवाल
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय लीक से हटकर फैसले लेने से हिचक नहीं रहे हैं। हाल ही में यह खबर सामने आई है कि विजय जल्द ही कावेरी विवाद को लेकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सीधी बातचीत करेंगे।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार के बीच जल्द ही एक बैठक हो सकती है। कावेरी जल विवाद को लेकर बुलाई गई यह बैठक काफी चर्चा में है। दरअसल मुख्यमंत्री थलपति विजय का यह कदम तमिलनाडु के तीन दशक पुराने रुख से बिल्कुल अलग है। इससे पहले तमिलनाडु हमेशा से बातचीत के बजाय अदालती फैसलों और ट्रिब्यूनल पर भरोसा करता आया है और राज्य के मुख्यमंत्री सीधी बातचीत से दूर ही रहे हैं। लेकिन अब विजय लीक से हटकर राह पकड़ रहे हैं। तमिलनाडु का मानना रहा है कि कावेरी विवाद दो मुख्यमंत्रियों की मेज पर बैठकर नहीं सुलझ सकता। हालांकि सीएम विजय सीधे संवाद का रास्ता अपना रहे हैं।
विजय ने पानी के संकट को हल करने के लिए शिवकुमार के साथ 31 जुलाई से 3 अगस्त के बीच सीधी बातचीत का प्रस्ताव रखा है। अगर यह मुलाकात होती है, तो पिछले 14 सालों में यह पहला मौका होगा जब दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री कावेरी मुद्दे पर आमने-सामने बैठकर द्विपक्षीय बातचीत करेंगे।
लीक से हटकर चल रहे विजय
इससे पहले पिछले 30 से अधिक सालों से चेन्नई का मानना रहा है कि यह विवाद इतिहास, फसलों और चुनावी भावनाओं जैसे जटिल मुद्दों से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसे किसी बैठक में सुलझाने के बजाय कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), ट्रिब्यूनल के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के जरिए ही लागू किया जाना चाहिए। वहीं विजय कानूनी अधिकारों को छेड़े बिना, दोनों राज्यों के बीच संवाद का रास्ता खोलना चाहते हैं ताकि संकट की स्थिति में पानी की आपूर्ति जारी रहे।
क्यों पड़ी बातचीत की जरूरत?
तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा के किसानों के सामने इस समय संकट बेहद गंभीर है। ट्रिब्यूनल के आदेश के तहत 1 जून से 23 जुलाई के बीच तमिलनाडु को लगभग 32 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना चाहिए था। लेकिन उसे केवल 3.5 TMC पानी ही मिला है। तमिलनाडु का मानना है कि कमजोर मॉनसून के बावजूद, कर्नाटक को कम से कम 3 TMC अतिरिक्त पानी तुरंत छोड़ना चाहिए था। पानी की कमी के कारण कावेरी डेल्टा में खड़ी फसलें सूखने की कगार पर हैं।
क्यों उठ रहे सवाल?
विजय की इस सीधी बातचीत की पहल पर विपक्षी दलों और किसान संगठनों ने कुछ चिंताएं जताई हैं। आलोचकों को डर है कि सीधी बातचीत से कर्नाटक को 'कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण' को दरकिनार करने का मौका मिल सकता है। यह शक भी है कि कर्नाटक पानी छोड़ने के बदले तमिलनाडु पर मेकेदातु में प्रस्तावित डैम के निर्माण पर विरोध वापस लेने का दबाव बना सकता है। इस मामले पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के कन्नन का कहना है कि मुख्यमंत्रियों की बातचीत आपसी सहयोग का माहौल बना सकती है, लेकिन यह ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए अधिकारों की जगह नहीं ले सकती।
क्या है राजनीतिक समीकरण?
राजनीतिक रूप से विजय के पास एक फायदा यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, जो तमिलनाडु में विजय की सरकार की सहयोगी भूमिका में है। राहुल गांधी विजय के शपथ ग्रहण में शामिल हुए थे और डीके शिवकुमार से भी उनके मधुर संबंध हैं। ऐसे में विजय के लिए राह आसान हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जल विवादों में पार्टी लाइनें अक्सर बेअसर हो जाती हैं, क्योंकि दोनों राज्यों के नेताओं को अपने-अपने किसानों और स्थानीय जनता को जवाब देना होता है। अगर विजय बेंगलुरु में वार्ता से अपने राज्य के लिए तुरंत कावेरी का पानी लाने में सफल रहते हैं और मेकेदातु पर तमिलनाडु के रुख से समझौता नहीं करते, तो यह उनकी बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जाएगी। वहीं, अगर यह बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म होती है, तो आलोचक इसे राजनीतिक अपरिपक्वता करार देंगे।


