जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर फैसला लें, SC ने राज्यों को दी इतनी मोहलत; आपत्ति खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को ट्रायल कोर्ट जजों की रिटायरमेंट उम्र 60 से 62 साल करने पर 2 सितंबर तक फैसला लेने को कहा। कोर्ट ने राज्यों की वित्तीय बोझ वाली दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों (ट्रायल कोर्ट) के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र को लेकर एक अहम निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे ट्रायल कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट की उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने पर आगामी 2 सितंबर तक अपना फैसला लें। इस दौरान कोर्ट ने राज्यों की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें वित्तीय बोझ बढ़ने और अन्य सरकारी कर्मचारियों के साथ भेदभाव होने का हवाला दिया गया था।
राज्यों की क्या थी दलील?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कुछ राज्य सरकारों ने तर्क दिया था कि अगर जजों की रिटायरमेंट उम्र 62 साल की जाती है, तो इससे सरकारी कर्मचारियों के बीच असंतोष फैलेगा। वे भी अपने लिए समान फायदों की मांग करेंगे, जिससे सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। गौरतलब है कि कुछ राज्यों ने पहले ही न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 61 साल कर दी है, जो उनके सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले लाभ के समान ही है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया यह तर्क
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने राज्यों की इन दोनों आपत्तियों को खारिज कर दिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि जब कोई न्यायिक अधिकारी रिटायर होता है, तो सरकार उसे एकमुश्त रकम और पेंशन देती है जो उसकी अंतिम सैलरी के आधे से ज्यादा होती है। इसके साथ ही रिक्त पद पर नई नियुक्ति होने पर नए जज को भी वेतन देना पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि इसके उलट, अनुभवी और परिपक्व जजों को सेवा में बनाए रखना राज्य और न्यायपालिका दोनों के लिए आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद साबित होगा।
'सरकारी कर्मचारियों से बिल्कुल अलग हैं न्यायिक अधिकारी'
सरकारी कर्मचारियों के साथ समानता की दलील को ठुकराते हुए बेंच ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति एक संवैधानिक व्यवस्था के तहत होती है, इसलिए वे सरकारी कर्मचारियों से एक अलग वर्ग हैं। बेंच ने राज्यों के महाधिवक्ताओं (एडवोकेट जनरल) से अपनी-अपनी सरकारों को यह समझाने को कहा कि वे सरकारी कर्मचारियों की मौजूदा रिटायरमेंट उम्र की परवाह किए बिना जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर पुनर्विचार करें।
प्रशासनिक फैसले से सुलझेगा मामला
बेंच का मानना है कि राज्यों के दिए गए दोनों कारण मान्य नहीं हैं, लेकिन इस मुद्दे को राज्यों के प्रशासनिक फैसलों के जरिए सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस बार कोई न्यायिक आदेश पारित करने के बजाय फैसला राज्य सरकारों पर छोड़ा है। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने सभी हाई कोर्ट्स से भी अनुरोध किया है कि वे जजों की रिटायरमेंट उम्र 60 से 62 साल करने के पक्ष में 'फुल-कोर्ट प्रस्ताव' पारित कर राज्य सरकारों के हाथ मजबूत करें।
1992 से अब तक दोगुने हुए जज
आपको बता दें कि 1990 के दशक की शुरुआत में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के जरिए देशभर के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 58 से बढ़ाकर 60 साल कर दी थी। आंकड़ों पर नजर डालें तो 1992 से लेकर अब तक ट्रायल कोर्ट के जजों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। यह 10,000 से बढ़कर मौजूदा समय में 20,000 से अधिक हो गई है। वहीं, हाई कोर्ट के जजों की संख्या भी 1992 के 568 से बढ़कर अब 1,114 हो गई है।
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