सब पहले से तय था… SIR वाले फैसले पर भड़के योगेंद्र यादव; SC को बता दिया ‘उपभोक्ता फोरम’

लाइव हिन्दुस्तान
Follow us on Google News
share

वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मुख्य याचिकाकर्ता योगेंद्र यादव ने तीखा हमला बोला है। यादव ने इस फैसले को आज के दौर का 'ADM जबलपुर केस' बताते हुए कहा कि कोर्ट ने चुनाव आयोग को खुली छूट दे दी है।

सब पहले से तय था… SIR वाले फैसले पर भड़के योगेंद्र यादव; SC को बता दिया ‘उपभोक्ता फोरम’

वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता रहे योगेंद्र यादव ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। योगेंद्र यादव ने इस फैसले को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा झटका बताया है। उन्होंने एक बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट पर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हटने का आरोप लगाया है। साथ ही इस फैसले की तुलना 1976 के कुख्यात 'एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला' केस से की है। योगेंद्र यादव के बयान के आधार पर आइए जानते हैं कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर क्या-क्या आपत्तियां जताई हैं:

'मुझे कोई उम्मीद नहीं थी, फैसला तो पहले ही हो चुका था'

योगेंद्र यादव ने अपने बयान की शुरुआत में ही साफ कर दिया कि वह फैसला सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं गए थे। उन्होंने कहा, "इस मामले में एक वादी होने के नाते और कोर्ट के सामने अपनी बात रखने का सम्मान पाने वाले व्यक्ति के तौर पर मुझे आज आशान्वित, चिंतित या कम से कम उत्सुक होना चाहिए था, लेकिन मैं नहीं था। इस केस का फैसला बहुत पहले ही हो चुका था। हम तो बस इसकी फाइनल कॉपी और उसमें लिखी बारीकियों का इंतजार कर रहे थे।"

'संवैधानिक अदालत से उपभोक्ता फोरम बन गया सुप्रीम कोर्ट'

योगेंद्र यादव के मुताबिक, इस मामले की दिशा पिछले साल अगस्त में ही तय हो गई थी। उन्होंने कहा कि तीन दिनों तक SIR के खिलाफ दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने इसके संवैधानिक पहलू की जांच करने से किनारा कर लिया। इसके बजाय सुप्रीम कोर्ट एक 'उपभोक्ता फोरम' की तरह काम करने लगा, जिसका पूरा ध्यान संवैधानिक सिद्धांतों पर न होकर सिर्फ शिकायत निवारण पर केंद्रित हो गया था।

योगेंद्र यादव ने बयान में उठाए ये बड़े सवाल

चुनाव आयोग को दी खुली छूट: योगेंद्र यादव का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) को बिना मामले का निपटारा किए बिहार चुनाव जल्दबाजी में कराने की इजाजत दी, तभी इस केस का फैसला प्रभावी रूप से हो गया था। आयोग ने वोटर लिस्ट की सबसे बड़ी खामियों को सुधारे बिना चुनाव कराए।

जजों की टिप्पणियों पर उठाए सवाल: योगेंद्र यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की आराम से सुनवाई करता रहा और चुनाव आयोग ने SIR का दूसरा और तीसरा चरण भी पूरा कर लिया। जब जजों ने खुली अदालत में यह टिप्पणी की कि 'किसी को भी SIR की प्रक्रिया बाधित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी', तब बचा-खुचा संदेह भी खत्म हो गया।

लाखों के वोटिंग अधिकार छिनने की चिंता नहीं: उन्होंने एक अन्य याचिका की सुनवाई का जिक्र करते हुए कहा कि एक जज ने टिप्पणी की थी कि जिन लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया है, उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है, वे अगले चुनाव में वोट दे सकते हैं।योगेंद्र यादव के अनुसार, "उसी पल अदालत ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था।"

'5.9 करोड़ से 10 करोड़ नागरिकों का छिना मताधिकार'

योगेंद्र यादव ने इसे संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक त्रासदी बताते हुए कहा, "कानूनी शब्दावली को अगर किनारे रख दें, तो सीधा सच यह है कि एक संवैधानिक लोकतंत्र की सर्वोच्च अदालत ने लाखों नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने को अपनी मंजूरी दे दी है। अब तक कम से कम 5.9 करोड़ लोगों का नाम काटा गया है, और अंततः यह आंकड़ा 10 करोड़ तक जा सकता है।"

ADR बनाम भारत संघ (2026) = ADM जबलपुर (1976)

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की तीखी आलोचना करते हुए योगेंद्र यादव ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया। उन्होंने कहा, "वकील केवल इस बात का इंतजार कर रहे थे कि जो फैसला पहले से सबको पता है, उसे सही ठहराने के लिए कोर्ट कौन सा कानूनी दांव-पेंच अपनाएगा। मुझे इस कानूनी जिम्नास्टिक में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कोर्ट ने चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट के साथ मनमानी करने की पूरी छूट दे दी है।"

अंत में उन्होंने इस केस (ADR बनाम भारत संघ- 2026) को आज के दौर का 'ADM जबलपुर' करार दिया। योगेंद्र यादव ने उम्मीद जताई कि SIR का यह फैसला आखिरी संवैधानिक दीवार के ढहने का प्रतीक नहीं बनेगा और एक दिन संविधान के संरक्षक द्वारा किए गए इस 'संवैधानिक त्याग' को पहचाना जाएगा और इसे पलटा जाएगा। उन्होंने अपने बयान का अंत "जय हिंद!" के साथ किया है।

एक अन्य पोस्ट में योगेंद्र यादव ने लिखा, "खबर ये नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने आज चुनाव आयोग के SIR को संवैधानिक बता दिया है। असली खबर ये है कि अब इस देश में भाजपा तय करेगी कि कौन वोट कर सकता है और कौन नहीं। खबर ये है कि इस देश के संविधान को बचाने का जो शायद अंतिम स्तंभ था, उसके कुछ हिस्से आज टूटकर गिर गए। #KhabarYehNahiHai"

ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) क्या था?

एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) केस को भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे 'काला अध्याय' माना जाता है। इसे कानूनी हलकों में 'बंदी प्रत्यक्षीकरण केस' के नाम से भी जाना जाता है। योगेंद्र यादव ने वोटर लिस्ट विवाद में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले की तुलना इस केस से इसलिए की, क्योंकि एडीएम जबलपुर केस में भी सुप्रीम कोर्ट पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में बुरी तरह विफल रहने का आरोप लगा था।

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी (आपातकाल) लगा दी थी। सरकार ने एक बेहद सख्त कानून लागू किया जिसका नाम था- MISA (Maintenance of Internal Security Act)। इस कानून के तहत सरकार बिना कोई कारण बताए किसी भी राजनीतिक विरोधी, नेता या आम नागरिक को जेल में डाल सकती थी।

जब मीसा के तहत अंधाधुंध गिरफ्तारियां होने लगीं, तो कई लोगों (जैसे शिवकांत शुक्ला) ने अलग-अलग हाईकोर्ट्स में 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिकाएं दायर कीं। बंदी प्रत्यक्षीकरण का मतलब होता है- 'गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश करो और बताओ कि उसे क्यों गिरफ्तार किया गया है।' कई हाईकोर्ट्स ने गिरफ्तार लोगों के पक्ष में फैसला दिया। इसके खिलाफ इंदिरा गांधी की सरकार (ADM जबलपुर यानी एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के जरिए) सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि: क्या इमरजेंसी के दौरान भारत के नागरिकों के 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' (संविधान का अनुच्छेद 21) पूरी तरह से सस्पेंड हो जाता है? क्या कोई नागरिक अपनी अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकता है? 28 अप्रैल 1976 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि देश में इमरजेंसी लगी है, इसलिए नागरिकों के पास अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार और स्वतंत्रता) के तहत अदालत जाने का कोई अधिकार नहीं है। सरल शब्दों में- "सरकार अगर किसी नागरिक को बिना कारण बताए जेल में डाल दे या मार भी दे, तो कोर्ट इसमें कोई दखल नहीं दे सकता।"

जस्टिस एच.आर. खन्ना का ऐतिहासिक विरोध

5 जजों की बेंच में से 4 जजों (तत्कालीन CJI ए.एन. रे, जस्टिस एम.एच. बेग, जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ और जस्टिस पी.एन. भगवती) ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। लेकिन एक जज, जस्टिस एच.आर. खन्ना ने इसके खिलाफ वोट किया। उन्होंने साफ कहा कि "आपातकाल के दौरान भी सरकार किसी नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता को बिना कानून के नहीं छीन सकती।" इस साहसिक फैसले की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी और इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें चीफ जस्टिस बनने से रोक दिया (सुपरसीड कर दिया), जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

योगेंद्र यादव ने इसकी तुलना क्यों की?

एडीएम जबलपुर (1976) केस को इस बात का प्रतीक माना जाता है कि कैसे सबसे बड़ी अदालत संकट के समय सरकार के सामने झुक गई और उसने आम लोगों के अधिकारों (स्वतंत्रता) को त्याग दिया। योगेंद्र यादव का तर्क है कि SIR (वोटर लिस्ट) केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मनमानी करने की छूट दे दी है और करोड़ों नागरिकों के वोटिंग के मौलिक अधिकार की रक्षा करने से मुंह मोड़ लिया है। एडीएम जबलपुर केस के फैसले को 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 'नितांत गलत' मानते हुए 'जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ' केस में औपचारिक रूप से पलट दिया था।

इस खबर पर आपकी क्या राय है?

Amit Kumar

लेखक के बारे में

Amit Kumar

डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

और पढ़ें