बिना परिसीमन महिला आरक्षण लागू करने में क्या अड़चन? मॉनसून सत्र से पहले SC ने केंद्र से मांगा जवाब
PIL में याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया है कि सरकार को 2001 या 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत महिला आरक्षण को तुरंत क्रियान्वित करना चाहिए। SC ने इस पर केंद्र से जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 जुलाई) को केंद्र सरकार को उस जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है और जवाब मांगा है, जिसमें महिला आरक्षण अधिनियम को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही लागू करने की मांग की गई है। इस याचिका में मांग की गई है कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण कानून को लागू किया जाए और इसके लिए नए सिरे से परिसीमन (delimitation) की प्रक्रिया का इंतज़ार न किया जाए। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने वकील योगमाया एमजी द्वारा दायर इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र से जवाब मांगा है।
इस जनहित याचिका में तर्क दिया गया है कि आरक्षण कानून को 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया तक अनिश्चित काल के लिए टालने के बजाय, 2001 या 2011 की जनगणना के आधार पर लागू किया जाना चाहिए। इसमें आगे कहा गया है कि हालांकि संसद ने महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान (128वां संशोधन) अधिनियम, 2023 पारित किया था, लेकिन यह कानून अभी तक लागू नहीं हो पाया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसे लागू करने की शर्त कानून के लागू होने के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दी गई है।
संविधान संशोधन बिल लोकसभा में गिरा
याचिका के अनुसार, इन प्रक्रियाओं के लिए अनिश्चित काल तक इंतज़ार करने से महिलाएं 2029 के आम चुनावों में भी आरक्षण के लाभ से वंचित रह सकती हैं। यह याचिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद ने हाल ही में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को खारिज कर दिया था। इस विधेयक का मकसद लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाना और देश भर में परिसीमन प्रक्रिया को संभव बनाना था। विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था। इसकी वजह से केंद्र ने परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 भी वापस ले लिए थे, जिससे परिसीमन की समय-सीमा अनिश्चित हो गई है।
पिछली जनगणना के आधार पर लागू करें आरक्षण
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया है कि वह केंद्र सरकार को निर्देश दे कि भविष्य की जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया का इंतज़ार करने के बजाय, परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत 2001 या 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करके महिला आरक्षण कानून को लागू किया जाए। इसमें तर्क दिया गया है कि समानता की संवैधानिक गारंटी के बावजूद, विधायिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी काफी कम है।
लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ़ 13.6 फीसदी
2024 के आम चुनावों के बाद संसद की बनावट का ज़िक्र करते हुए, याचिका में कहा गया है कि लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ़ 13.6 फीसदी और राज्यसभा में लगभग 14 फीसदी है, जो संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत को वैश्विक औसत से काफी नीचे रखता है। इसमें तर्क दिया गया है कि पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों, आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक संसाधनों की कमी और भेदभाव जैसी संरचनात्मक बाधाओं के कारण औपचारिक समानता का मतलब असल राजनीतिक सशक्तिकरण नहीं बन पाया है।
ज़मीनी स्तर की महिला नेताओं का हो प्रवेश
याचिका में यह भी कहा गया है कि भले ही संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व है, लेकिन कई महिलाएं स्वतंत्र रूप से ज़मीनी स्तर पर लामबंद होकर नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत, पारिवारिक पृष्ठभूमि, पार्टी के समर्थन या सेलिब्रिटी होने की वजह से चुनावी राजनीति में आती हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, आरक्षण के ढांचे को केवल आंकड़ों की कवायद के तौर पर नहीं, बल्कि एक लंबे समय तक सुधार करने वाले उपाय के तौर पर देखा जाना चाहिए, जिससे ज़मीनी स्तर की महिला नेता विधायी निकायों में प्रवेश कर सकें और कानून बनाने की प्रक्रिया में सार्थक रूप से भाग ले सकें।
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


