मंदिर से बहिष्कार समाज को बांट सकता है, हिंदू धर्म पर पड़ सकता है असर; सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की कि एक आशंका है। अगर आप प्रवेश के अधिकार की बात करते हैं, खासकर वेंकटरमण देवरू मामले के संदर्भ में, जिसमें यह कहा गया था कि गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के अलावा किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा, तो इसका हिंदू धर्म पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सभी मंदिरों और मठों में जाने का अधिकार होना चाहिए तथा किसी एक वर्ग को इससे बाहर रखना हिंदू धर्म पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा और समाज को बांट देगा। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के शबरिमला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। पीठ विभिन्न आस्थाओं के लोगों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और विस्तार पर भी विचार कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि मंदिर से किसी का बहिष्कार समाज को बांट सकता है, जिसका असर हिंदू धर्म पर बुरा पड़ सकता है।
पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। नायर सर्विस सोसाइटी, अयप्पा सेवा समाजम और क्षेत्र संरक्षण समिति जैसे संगठनों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील सी.एस. वैद्यनाथन ने दलील दी कि किसी वर्ग विशेष का मंदिर अन्य व्यक्ति को प्रवेश की अनुमति दे सकता है और उन्हें पूजा-अर्चना में शामिल कर सकता है, या फिर वह इसे केवल अपने वर्ग तक ही सीमित रख सकता है।
इस पर, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, ''एक आशंका है। अगर आप प्रवेश के अधिकार की बात करते हैं, खासकर 'वेंकटरमण देवरू' मामले के संदर्भ में, जिसमें यह कहा गया था कि गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के अलावा किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा, तो इसका हिंदू धर्म पर नकारात्मक असर पड़ेगा।'' उन्होंने कहा, ''प्रत्येक व्यक्ति को हर मंदिर और मठ में प्रवेश का अधिकार होना चाहिए। शबरिमला फैसले से जुड़े विवाद को एक तरफ रख दें। लेकिन अगर आप यह कहते हैं कि यह एक परंपरा है और यह धर्म का मामला है कि मैं दूसरों को बाहर रखूंगा और केवल मेरे वर्ग, मेरे संप्रदाय के लोग ही मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं, कोई और नहीं, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। धर्म पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यह उसके लिए नुकसानदायक ही साबित होगा।''
इस बात से सहमत होते हुए, न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि इस तरह का निष्कासन समाज को बांट देगा। वैद्यनाथन ने दलील दी कि यदि मंदिर केवल अपने ही वर्ग के लिए होंगे, तो वे न तो सरकार से, न ही निजी दानदाताओं से और न ही आम लोगों से धन की मांग कर सकते हैं, क्योंकि वे उन पर निर्भर नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि अगर कोई कानून बनाया जाना है, तो उसे लोक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
देवरू फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने मद्रास मंदिर प्रवेश अनुमति अधिनियम को बरकरार रखा था, और यह पुष्टि की थी कि मंदिर सभी हिंदुओं के लिए खुला हुआ है, वहीं गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के लिए आरक्षित कुछ धार्मिक अनुष्ठानों की संवैधानिक रूप से अनुमति है। नौ न्यायाधीशों की पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े सात सवाल तैयार किए हैं। सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से दिए गए निर्णय में, 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध को हटा दिया था। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक परंपरा अवैध और असंवैधानिक है।
बाद में, 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की एक और पीठ ने 3:2 के बहुमत से, विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। पीठ ने सभी धर्मों में स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक मुद्दे तय करते हुए कहा कि किसी खास मामले के तथ्यों के बिना इन पर निर्णय नहीं किया जा सकता।
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