पत्नी का अफेयर पति की आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा HC का फैसला

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: जीवनसाथी का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर (विवाहेतर संबंध) आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं है। जानें अदालत ने धारा 306 और आपराधिक मंशा को लेकर क्या कहा।

पत्नी का अफेयर पति की आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा HC का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी या पति के विवाहेतर संबंधों यानी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के तनाव के कारण आत्महत्या कर लेता है, तो केवल इस संबंध के आधार पर पार्टनर पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

आत्महत्या के लिए उकसाने की शर्तें

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अतुल चंदुरकर की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत किसी पर आरोप तय करने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, एक स्पष्ट इरादे के साथ आत्महत्या में योगदान दिया हो। अदालत ने कहा कि 'उकसाने' के लिए कोई ऐसा सक्रिय कदम होना चाहिए जिससे मृतक के पास अपनी जान लेने के अलावा कोई और विकल्प ही न बचे।

'आपराधिक मंशा' का होना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ मामला रद्द कर दिया, जिस पर मृतक की पत्नी के साथ संबंध होने का आरोप था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि: भले ही यह मान लिया जाए कि उनके बीच अवैध संबंध थे, लेकिन इसमें आत्महत्या के लिए उकसाने की आपराधिक मंशा नहीं थी। पीठ ने कहा- ऐसा कोई आरोप या सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि अपीलकर्ता (पत्नी के प्रेमी) ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया हो या किसी अवैध कृत्य/चूक के जरिए उसे अपनी जान लेने में मदद की हो।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला पलटा

शीर्ष अदालत ने इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल इस आधार पर ट्रायल चलाने की अनुमति दी गई थी कि मृतक अपनी पत्नी के कथित संबंधों की वजह से परेशान और तनाव में था। अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि पत्नी के प्रेमी की मौजूदगी में मृतक का अपमान होना आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।

पत्नी को राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई यह राहत केवल उस व्यक्ति यानी पत्नी के प्रेमी के लिए है जिसने अदालत में अपील की थी। मृतक की पत्नी भी इस मामले में सह-आरोपी है, लेकिन उसने अपने खिलाफ चल रहे ट्रायल को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए उसके खिलाफ मामला चलता रहेगा।

अदालत ने अपने फैसले का सार बताते हुए कहा कि उकसाने के किसी 'सकारात्मक कृत्य' को दर्शाने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए। इसके अलावा, यह उकसावा आत्महत्या की घटना के बिल्कुल करीब के समय में होना चाहिए, ताकि कृत्य और आत्महत्या के बीच एक स्पष्ट संबंध स्थापित किया जा सके। केवल संबंध होने के तनाव को उकसावा नहीं माना जा सकता।

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