33 साल पहले हुए थे बर्खास्त, अब वायुसेना देगी सम्मानजनक विदाई; SC का ऐतिहासिक फैसला
1993 में गलत तरीके से बर्खास्त किए गए IAF के पूर्व अधिकारी आर. सूद को 30 साल बाद मिलेगी सम्मानजनक विदाई। अदालत ने बर्खास्तगी को रद्द कर बकाया वेतन और पेंशन देने का आदेश दिया। पढ़ें पूरी खबर।

भारतीय वायुसेना (IAF) से बर्खास्त किए गए एक पूर्व अधिकारी को तीन दशक बाद आखिरकार अपना सम्मान वापस मिलने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि 1993 में उन्हें सेवा से हटाना एक गलत और अनुचित कदम था। अदालत ने एक दुर्लभ आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया है कि 70 वर्ष से अधिक उम्र के इस पूर्व अधिकारी को एक औपचारिक और सम्मानजनक विदाई दी जाए। कोर्ट ने एक बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि एक सैनिक के लिए अपने सम्मान की बहाली सबसे बड़ी चिंता का विषय होती है।
अदालत के फैसले की मुख्य बातें
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की 1993 की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वायुसेना द्वारा लिया गया यह निर्णय कानूनी रूप से अस्थिर और दोषपूर्ण था। अदालत द्वारा आर. सूद को दिए गए मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
औपचारिक विदाई: वायुसेना प्रमुख द्वारा तय की गई तारीख पर उन्हें सेना के नियमों के तहत उसी तरह विदाई दी जाएगी, जिसके वे अपनी सेवा पूरी करने के बाद हकदार होते।
आर्थिक लाभ और पदोन्नति: उन्हें 50% पिछला वेतन, अनुमानित पदोन्नति और पेंशन के सभी लाभ दिए जाएंगे।
ब्याज: उन्हें 1990 के दशक में दायर की गई रिट याचिका की तारीख से उनके सभी बकाया राशि पर 9% का ब्याज भी दिया जाएगा।
क्या था पूरा मामला?
आर. सूद को 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। यह कार्रवाई 1987 की एक घटना से जुड़ी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान के एक सुनसान इलाके में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले थे। इसी मामले में कदाचार का दोषी मानते हुए वायुसेना ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने वायुसेना की कार्रवाई को गलत क्यों माना?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के दौरान वायुसेना की अनुशासनात्मक कार्रवाई में कई गंभीर खामियां पाईं।
1. आपराधिक अदालत से पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट: सबसे अहम बात यह थी कि सबूतों के अभाव में एक आपराधिक अदालत ने आर. सूद को पहले ही आरोपमुक्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'डिस्चार्ज' होने का मतलब है कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत ही मौजूद नहीं थे। ऐसे में उन्हीं तथ्यों के आधार पर विभाग द्वारा दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई करना पूरी तरह से गलत था।
2. समानता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन: कोर्ट ने अधिकारियों को दी गई सजा में भारी भेदभाव पर कड़ी आपत्ति जताई। आर. सूद के कमांडिंग ऑफिसर, जिन्होंने वास्तव में निर्देश जारी किए थे, उन्हें गहरी नाराजगी जैसी मामूली सजा देकर छोड़ दिया गया। दूसरी ओर, उनके आदेशों का पालन करने वाले आर. सूद को 'बर्खास्तगी' जैसी सबसे कठोर सजा दी गई।
3. वरिष्ठ के आदेश का पालन करने पर कड़ी सजा नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक अधीनस्थ अधिकारी को अपने वरिष्ठ अधिकारी के गलत आदेश का पालन करने के लिए बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता है। सजा के मामले में दोनों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए था।
प्रतीकात्मक न्याय और सम्मान की वापसी
चूंकि आर. सूद अब रिटायरमेंट की उम्र को पार कर चुके हैं, इसलिए उन्हें आधिकारिक तौर पर सेवा में वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें वे सभी लाभ मिलने चाहिए मानो उन्हें कभी बर्खास्त ही न किया गया हो। आर्थिक राहत से भी ज्यादा, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रतीकात्मक न्याय पर जोर दिया। कोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि वित्तीय लाभ चाहे कितने भी हों, एक सैन्य अधिकारी के लिए उसके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसका सम्मान होती है, जिसे कोर्ट ने 30 साल बाद ससम्मान लौटा दिया है।
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