आवारा कुत्तों के मामले में फैसला सुरक्षित, SC ने हफ्ते भर के अंदर वकीलों से मांगी दलीलें
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सभी राज्यों के सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा। कोर्ट ने कल कुछ राज्यों द्वारा दायर किए गए अस्पष्ट हलफनामों पर नाराज़गी जताई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें आवारा कुत्तों के मामले में दिए गए पहले के आदेश में बदलाव की मांग की गई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से एक हफ्ते के अंदर अपनी लिखित दलीलें जमा करने को कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सभी राज्यों के सभी पक्षों, नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) और एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) द्वारा दी गई दलीलों के आखिरी दौर की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
इससे पहले कुत्ते पालने वालों, कुत्ते के काटने की घटनाओं के पीड़ितों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से पेश हुए वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। कोर्ट ने कल कुछ राज्यों द्वारा दायर किए गए अस्पष्ट हलफनामों पर नाराजगी जताई थी। बार एंड बेंच के मुताबिक, स्वतः संज्ञान मामले में कोर्ट ने आज NHAI से एक ऐप बनाने का भी आग्रह किया, जिसके ज़रिए लोग हाईवे पर आवारा जानवरों को देखने की रिपोर्ट कर सकें। कोर्ट ने कहा, "आप एक ऐप क्यों नहीं बनाते ताकि कोई भी जानवर को देखकर उसकी तस्वीर खींचकर अपलोड कर सके? आपके पास विज़ुअल्स होंगे।" इस पर NHAI के वकील ने जवाब दिया, "हम ऐसा करेंगे।"
देश में सिर्फ 76 मान्यता प्राप्त स्टेरिलाइज़ेशन सेंटर
खास बात यह है कि जैसे ही सुनवाई खत्म होने वाली थी, AWBI के वकील ने कोर्ट को बताया कि देश में सिर्फ 76 मान्यता प्राप्त स्टेरिलाइज़ेशन सेंटर हैं, जबकि विभिन्न राज्यों के डेटा से पता चलता है कि 883 आवारा कुत्तों के स्टेरिलाइज़ेशन सेंटर हैं। वकील ने कहा, “कुछ आवेदन पेंडिंग हैं। 250 से ज़्यादा आवेदन हैं... राज्यों द्वारा दिए गए डेटा के अनुसार 883 चल रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक हमारी तरफ से मान्यता नहीं दी गई है।”
कोर्ट ने आखिर में पूछा, "जिन सेंटरों को आपने (AWBI) मान्यता नहीं दी है, उनमें क्या हो रहा है?" इससे AWBI के वकील ने स्टेरिलाइज़ेशन के कुछ डेटा में विसंगति की ओर इशारा किया, जिससे शायद यह पता चलता है कि संख्या उतनी सटीक नहीं थी जितनी दावा किया गया था। इससे यह चिंता भी बढ़ी कि स्टेरिलाइज़ेशन के लिए तय फंड उन लोगों द्वारा लिया जा रहा था जो असल में ऐसा काम नहीं कर रहे थे। कई राज्यों ने इस बारे में जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं कराई है।
जहां कुत्ते कम वहां स्टेरिलाइज़ेशन ज्यादा
वकील ने कहा, "आश्चर्यजनक डेटा है। जहां कुत्तों की आबादी कम है जैसे उत्तराखंड में, वहां स्टेरिलाइज़ेशन ज़्यादा है (रिपोर्ट किए गए स्टेरिलाइज़ेशन की संख्या कुत्तों की आबादी की संख्या से ज़्यादा है)।" इस पर कोर्ट ने कहा, “कारण साफ हैं। हर कोई इसके बारे में जानता है। कितनी ग्रांट दी जाती है।” इसके बाद वकील ने कहा, "जितना कम कहा जाए, उतना अच्छा।" इस पर कोर्ट ने कहा, "हां। कम कहना ही बेहतर है।" कोर्ट ने आगे कहा, "AWBI से बस यही अनुरोध है कि जो भी आवेदन पेंडिंग हैं, आप उन्हें प्रोसेस करें, और या तो उन्हें रिजेक्ट करें या एक तय समय के अंदर उन्हें मंज़ूरी दें।"
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।



