विकास के मुद्दे का राजनीतिकरण; ममता बनर्जी सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई है। हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची राज्य सरकार की क्लास लगाते हुएकोर्ट ने राज्य सरकार के ऊपर महत्वपूर्ण विकास कार्यों का विशुद्ध राजनीतिकरण करने का आरोप भी लगाया।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले केंद्र सरकार बनाम राज्य सरकार के बीच का मेट्रो वाला मामला हाई कोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है। सुप्रीम कोर्ट पहुंची पश्चिम बंगाल सरकार को सोमवार को सुनवाई के दौरान तीखी फटकार का सामना करना पड़ा। कोर्ट ने राज्य सरकार के ऊपर महत्वपूर्ण विकास कार्यों का विशुद्ध राजनीतिकरण करने का आरोप भी लगाया। इसके साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया विकास कार्यों को त्योहारों या आगामी चुनावों के आधार पर रोका नहीं जा सकता है।
पीठ ने जोर दिया कि एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार का कर्तव्य ऐसे विकास कार्यों को बाधित करने के बजाय सुगम बनाना है, न कि विकास गतिविधियों पर त्योहारों को प्राथमिकता देना।मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम.पंचोली की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश में कोई खामी नहीं पाई गयी और राज्य का रुख परियोजना में देरी करने और उसे रोकने के उद्देश्य से एक अड़ियल रवैये को दर्शाता है। न्यायालय ने कहा कि अस्थायी यातायात प्रतिबंधों से बचने के लिए त्योहारों के सीजन और आगामी चुनावों का हवाला देना अनुचित है और यह एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक परिवहन परियोजना को आगे बढ़ाने में अनिच्छा को दर्शाता है।
क्या है मामला?
दरअसल, यह पूरा मामला राज्य के चिंगरीहाटा में ऑरेंज लाइन मेट्रो के 366 मीटर के हिस्से के निर्माण को लेकर जुड़ा हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार और कोलकाता पुलिस ने साल के अंत के त्योहारों, गंगासागर मेले और आगामी चुनावों के दौरान भारी यातायात का हवाला देते हुए यातायात को रोकने के लिए आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) देने से इनकार कर दिया था। जिस पर यह मामला हाई कोर्ट पहुंच गया। जहां पर कोलकाता हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए इस क्षेत्र में रात के समय साप्ताहांत पर यातायात बंद रखने का निर्देश दिया था। पश्चिम बंगाल सरकार इस निर्देश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को तीखी फटकार लगाई। पीठ ने जोर दिया कि एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार का कर्तव्य ऐसे विकास कार्यों को बाधित करने के बजाय सुगम बनाना है, न कि विकास गतिविधियों पर त्योहारों को प्राथमिकता देना। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार से यह उम्मीद नहीं करती है कि वह इस तरह के विकास कार्य की अनदेखी करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाए।
पीठ ने कहा कि राज्य विकास की तुलना में त्योहारों को अधिक महत्वपूर्ण मान रहा है। साथ ही पीठ ने सवाल किया कि क्या ऐसी प्राथमिकताएं तब उचित हैं जब एक बड़ी परिवहन परियोजना शामिल हो। आगामी चुनावों के संबंध में दी गई दलील पर न्यायालय ने कहा कि परियोजना आदर्श आचार संहिता लागू होने से काफी पहले शुरू हो गई थी और उस आधार पर इसे रोका नहीं जा सकता। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ऐसे आधारों का उपयोग आवश्यक सार्वजनिक कार्यों में देरी करने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय ने इस मामले में उदार रुख अपनाया है वह अनुपालन सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के खिलाफ कार्रवाई की मांग क सकता था। पीठ ने कहा कि राज्य का आचरण संवैधानिक कर्तव्य की अवहेलना और विशुद्ध रूप से विकास के मुद्दे का राजनीतिकरण करने का प्रयास है। मुख्य न्यायाधीश कहा, "यह आपके संवैधानिक कर्तव्य की पूर्ण अवहेलना को दर्शाता है। यह केवल एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिकरण करने का प्रयास है जहां कोई मुद्दा ही नहीं है।"
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