SC की टिप्पणी से हूं आहत, नहीं करनी सुनवाई, रोस्टर से हटाएं मुझे; चीफ जस्टिस से HC जज की दो टूक
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जस्टिस भाटिया की आलोचना की थी और उनके दिए गए बेल ऑर्डर को हाल के दिनों में देखे गए सबसे चौंकाने वाले और निराशाजनक ऑर्डर में से एक बताया था। इसी से वह निराश हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया ने आज (शुक्रवार, 13 फरवरी को) एक जमानत याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया और कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियों ने उन्हें मानसिक रूप से निराश किया है। उन्होंने इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि भविष्य में उन्हें जमानत मामलों की रोस्टर जिम्मेदारी न दी जाए। जस्टिस भाटिया ने एक बेल अर्जी पर सुनवाई से खुद को अलग करते हुए अपने आदेश में कहा कि संबंधित जमानत याचिका को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष दूसरी पीठ को सौंपने के लिए रखा जाए।
हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि किसी भी न्यायाधीश का आदेश शीर्ष अदालत द्वारा बदला या रद्द किया जा सकता है, लेकिन शीर्ष अदालत की टिप्पणी के कुछ हिस्सों का उन पर “निराशाजनक और ठंडा प्रभाव” पड़ा है। दरअसल, हाल ही में शीर्ष अदालत ने उनके एक जमानत आदेश पर कड़ी टिप्पणी की थी। टॉप कोर्ट ने जस्टिस भाटिया की आलोचना करते हुए उनके दिए गए बेल ऑर्डर को हाल के दिनों में देखे गए "सबसे चौंकाने वाले और निराशाजनक" ऑर्डर में से एक बताया था।
क्या है मामला?
यह मामला दहेज मौत से जुड़े एक गंभीर अपराध में आरोपी को जमानत देने से संबंधित था। इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल थे। पीठ ने कहा था कि हाई कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी को जमानत देने के लिए किन आधारों पर विवेकाधिकार का इस्तेमाल किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की थी?
जस्टिस भाटिया के आदेश पर SC की बेंच ने कहा था, “हम इस आदेश को सीधे पढ़ने पर यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हाई कोर्ट क्या कहना चाह रहा है। दहेज हत्या जैसे बहुत गंभीर अपराध में जमानत देने के लिए आरोपी के पक्ष में अपने अधिकार का इस्तेमाल करने में हाई कोर्ट को क्या दिक्कत थी। हाई कोर्ट ने क्या किया? हाई कोर्ट ने बस बचाव पक्ष के वकील की बात रिकॉर्ड की और उसके बाद यह कहा कि आरोपी 27.07.2025 से जेल में है और उसकी कोई क्रिमिनल हिस्ट्री नहीं है, इसलिए वह जमानत का हकदार है। इसलिए, जमानत दे दी गई।”
मौजूदा मामले से नहीं ताल्लुक
बार एंड बेंच के मुताबिक, जस्टिस भाटिया ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस जमानत याचिका से उन्होंने खुद को अलग किया, उसका उस मामले से कोई संबंध नहीं था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने उस मामले की सुनवाई को उचित नहीं माना।
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।



