सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी लेयर पर क्या फैसला दिया? सरकार को टेंशन, दायर की याचिका
OBC क्रीमी लेयर मामले में सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले पर केंद्र ने स्पष्टीकरण मांगा है। करीब 100 CSE अभ्यर्थियों के दावों पर फैसले का असर पड़ सकता है। CSE-2025 की रैंक, सेवा आवंटन, कैडर और वरिष्ठता पर भी असर की चिंता जताई गई है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 11 मार्च के एक फैसले को लेकर स्पष्टीकरण और उचित निर्देश मांगे हैं। इस फैसले में 2016 से सिविल सेवा परीक्षा (CSE) में चयनित लेकिन क्रीमी लेयर के आधार पर खारिज किए गए करीब 100 OBC अभ्यर्थियों के दावों पर विचार करने का आदेश दिया गया था। अब केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने यह याचिका दाखिल की है।
याचिका ऐसे समय दाखिल हुई है, जब प्रभावित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन पूरा हो चुका है और सरकार फैसले को लागू करने की तैयारी कर रही थी। वहीं, CSE-2025 बैच के फाउंडेशन कोर्स की शुरुआत भी इसी सप्ताह मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में प्रस्तावित है।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से क्या कहा?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र का कहना है कि 11 मार्च का फैसला CSE-2025 का अंतिम परिणाम घोषित होने के पांच दिन बाद आया था। सरकार ने आशंका जताई है कि श्रेणीवार मेरिट और सेवा आवंटन सूची को अंतिम रूप देने में देरी का व्यापक असर पड़ सकता है।
सरकार के मुताबिक इससे -
- प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।
- बैच की संख्या और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था में बदलाव हो सकता है।
- संबंधित अकादमियों के तय प्रशिक्षण कैलेंडर पर असर पड़ सकता है।
- IAS और IPS अधिकारियों के कैडर आवंटन में बदलाव हो सकता है।
- नए बैच की वरिष्ठता और वेतन निर्धारण पर भी असर पड़ सकता है।
केंद्र ने कहा है कि CSE-2025 की पहले ही पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बिना किसी शर्त के पूर्व प्रभाव से लागू करने पर इसी परीक्षा चक्र के अभ्यर्थियों के बीच असमानता की स्थिति पैदा हो सकती है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसकी मौजूदा याचिका केवल CSE-2025 से संबंधित है। यह बैच फिलहाल सेवा आवंटन की अंतिम प्रक्रिया में है। हालांकि, याचिका में आने वाले बैचों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लागू होने को लेकर कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला OBC क्रीमी लेयर तय करने से जुड़े 1993 के आधिकारिक ज्ञापन और 2004 में DoPT की ओर से जारी स्पष्टीकरण से जुड़ा है। सितंबर 1993 के आधिकारिक ज्ञापन में OBC क्रीमी लेयर तय करने के लिए आय/संपत्ति की गणना में वेतन और कृषि आय को शामिल नहीं किया गया था। लेकिन 14 अक्टूबर 2004 को DoPT के स्पष्टीकरण में कहा गया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की वेतन आय को भी क्रीमी लेयर तय करने के मानदंड में शामिल किया जाएगा।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और PSU या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव की स्थिति पैदा हुई। यह व्यवस्था CSE-2015 यानी 2016 बैच से सख्ती से लागू की जाने लगी। इसके बाद सक्षम अधिकारियों द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र रखने और CSE पास करने वाले करीब 100 अभ्यर्थियों के OBC दावे DoPT ने क्रीमी लेयर के आधार पर खारिज कर दिए। इनमें से अधिकांश ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं।
खास बात यह है कि इनमें से कुछ अभ्यर्थियों ने UPSC या राज्य स्तरीय संस्थाओं की ओर से आयोजित दूसरी परीक्षाओं में OBC श्रेणी का लाभ हासिल किया था, लेकिन CSE प्रक्रिया में उनके दावे खारिज कर दिए गए।
11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
रोहित नाथन की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 11 मार्च को फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि OBC में क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल आय को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत के अनुसार क्रीमी लेयर को अलग करने का उद्देश्य सामाजिक रूप से समान स्थिति वाले OBC सदस्यों के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करना नहीं है। समान स्थिति वाले OBC अभ्यर्थियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना कानूनी और संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा।
अदालत ने यह भी कहा था कि PSU या निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बच्चों को केवल वेतन आय के आधार पर आरक्षण से बाहर करना, उनके पद की प्रकृति यानी ग्रुप A, B, C या D को ध्यान में रखे बिना, समान स्थिति वाले लोगों के साथ असमान व्यवहार होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में दिए गए समानता के सिद्धांत के तहत आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को लागू करने के लिए छह महीने का समय दिया था, जिसकी अवधि 11 सितंबर को समाप्त हो रही है।
पुराने अभ्यर्थियों को भी मिल सकता है फायदा
यदि 11 मार्च का फैसला पूरी तरह लागू किया जाता है तो इसका लाभ सिर्फ भविष्य में CSE देने वाले अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहेगा। पहले के परीक्षा चक्रों में प्रभावित हुए अभ्यर्थी भी इसके दायरे में आ सकते हैं। इसका असर कुछ अभ्यर्थियों की रैंक में बदलाव के रूप में भी सामने आ सकता है।
हालांकि, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि फैसले को पूर्व प्रभाव से इस तरह लागू न किया जाए जिससे उच्च शिक्षण संस्थानों में पहले से पूरी हो चुकी दाखिला प्रक्रिया, समाप्त हो चुके शैक्षणिक सत्र, पहले ही प्रदान की जा चुकी डिग्रियां या छात्रों के पहले से स्थापित अधिकार प्रभावित हों।
कुल मिलाकर, केंद्र की मौजूदा याचिका का मुख्य फोकस CSE-2025 की अंतिम सेवा आवंटन प्रक्रिया पर फैसले के संभावित प्रभाव को लेकर स्पष्टीकरण हासिल करना है। वहीं, 11 मार्च का सुप्रीम कोर्ट का फैसला OBC क्रीमी लेयर तय करने में केवल आय को आधार मानने की व्यवस्था पर महत्वपूर्ण सवाल उठा चुका है।


