UCC ही समाधान है...मुस्लिम महिलाओं के हक पर CJI सूर्यकांत के तीखे सवाल, शरिया कानून पर भी बोले
सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को लेकर अहम सुनवाई हुई। शरिया कानून, कानूनी शून्यता और UCC पर CJI और जजों ने क्या टिप्पणियां कीं, पूरी खबर विस्तार से पढ़ें।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कहा कि देश की सभी महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) का होना आवश्यक है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जोयमाला बागची की पीठ ने मुस्लिम महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकारों की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की।
अदालत की चिंताएं और मुख्य सवाल
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण से कई अहम सवाल किए। जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाई कोर्ट के ऐतिहासिक 'नरसू अप्पा माली' फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उन्होंने पूछा कि क्या अदालत किसी पर्सनल लॉ की संवैधानिकता पर फैसला सुना सकती है।
पीठ ने यह सवाल उठाया कि अगर अदालत शरिया विरासत कानून को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कोई कानूनी निर्वात (शून्य) पैदा नहीं होगा? CJI सूर्यकांत ने चिंता जताते हुए कहा- सुधार की हमारी अति-उत्सुकता में, ऐसा न हो कि हम उन्हें (मुस्लिम महिलाओं को) वंचित कर दें और उन्हें जो पहले से मिल रहा है उससे भी कम मिले। अगर 1937 का शरिया एक्ट खत्म हो जाता है तो क्या यह एक अनावश्यक शून्य पैदा नहीं करेगा?
वकील प्रशांत भूषण की दलीलें
अदालत के सवालों का जवाब देते हुए प्रशांत भूषण ने की तर्क पेश किए। भूषण ने कहा कि यदि शरिया विरासत कानून रद्द होता है, तो उत्पन्न होने वाले खालीपन में 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' के प्रावधान लागू होंगे। अदालत यह घोषणा कर सकती है कि मुस्लिम महिलाएं पुरुषों के समान विरासत अधिकारों की हकदार हैं।
शायरा बानो फैसले (2017) का हवाला
अदालत के हस्तक्षेप करने के अधिकार पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का जिक्र किया जिसने 'तीन तलाक' को असंवैधानिक घोषित किया था। उन्होंने तर्क दिया- शायरा बानो फैसले के बाद हम देश में ऐसी स्थिति नहीं रख सकते जहां मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार न मिलें।
विरासत नागरिक अधिकार है, धार्मिक नहीं
भूषण ने कहा कि विरासत का मामला एक नागरिक अधिकार है और इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' कहकर संरक्षित नहीं किया जा सकता। 'मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट' एक वैधानिक कानून है, और अदालत इसकी भेदभावपूर्ण बातों को रद्द कर सकती है।
समान नागरिक संहिता (UCC) और विधायी अधिकार
सुनवाई के दौरान यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का मुद्दा भी सामने आया। जस्टिस बागची ने कहा कि क्या इस मामले को विधायिका की बुद्धिमत्ता पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए, क्योंकि 'राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों' के तहत समान नागरिक संहिता बनाना उनका काम है। इस पर CJI ने भी सहमति जताते हुए कहा- इसका जवाब यूनिफॉर्म सिविल कोड है।
जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि 'एक पुरुष के लिए एक पत्नी' का नियम अभी सभी समुदायों पर समान रूप से लागू नहीं है। उन्होंने कहा- लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अदालत सभी बहुविवाहों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है? इसलिए हमें नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए विधायी शक्ति का सम्मान करना होगा।
अदालत का निर्देश
पीठ ने यह भी राय दी कि अगर खुद मुस्लिम महिलाएं शरिया एक्ट 1937 से बाहर निकलने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएं, तो न्यायिक हस्तक्षेप अधिक उचित होगा। इस पर भूषण ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं में कुछ मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं। अंत में, अदालत ने भूषण को अपनी याचिका में संशोधन करने का सुझाव दिया। पीठ ने कहा कि याचिका में यह स्पष्ट रूप से जोड़ा जाना चाहिए कि यदि शरिया के विरासत प्रावधानों को रद्द किया जाता है, तो उस स्थिति में कानूनी उपाय क्या होंगे। प्रशांत भूषण द्वारा याचिका में संशोधन करने की बात स्वीकार करने के बाद, अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।
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