'संदेह सबूत की जगह नहीं ले सकता', SC ने पति की हत्या के आरोप से महिला को 19 साल बाद किया बरी
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की लास्ट सीन थ्योरी भी कमजोर साबित हुई, क्योंकि मृत्यु का सही समय तय नहीं किया जा सका और गवाह के बयान में भी कई अस्वाभाविक बातें थीं। पीठ ने जांच एजेंसियों के काम पर भी सवाल उठाए।

19 साल पुराने हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी महिला को पूरी तरह बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल संदेह, चाहे वह कितना भी गंभीर क्यों न हो, किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकता। जज संजय करोल और जज प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 2010 के फैसले को बरकरार रखते हुए महाराष्ट्र सरकार की अपील खारिज कर दी। मामला फरवरी 2007 का है, जब बैंक कर्मचारी किरण सूर्यवंशी मृत पाए गए थे। पुलिस ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी मोनिका ने प्रेमी और एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर उनकी हत्या की साजिश रची थी।
सत्र अदालत ने 2008 में तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों को अपर्याप्त मानते हुए उन्हें बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह पूरा मामला साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसे सबूत पेश करने में विफल रहा, जिससे केवल आरोपियों का ही दोष सिद्ध होता। अदालत ने कहा कि मैरिटल अफेयर को हत्या का मुख्य कारण बताया गया था, उसे साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए। कुछ गवाहों के बयान और फोन कॉल रिकॉर्ड किसी अवैध संबंध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
गवाह के बयान में कई अस्वाभाविक बातें
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष की लास्ट सीन थ्योरी भी कमजोर साबित हुई, क्योंकि मृत्यु का सही समय निर्धारित नहीं किया जा सका और गवाह के बयान में भी कई अस्वाभाविक बातें थीं। पीठ ने जांच एजेंसियों के काम पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कथित हत्या में इस्तेमाल होने वाले खून से सने सिलबट्टे, सिरिंज और कपड़ों की बरामदगी प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। बरामद वस्तुओं को सही तरीके से सील नहीं किया गया था, जिससे उनके साथ छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा कथित हथियार सार्वजनिक स्थान से मिला था, जिससे उसका साक्ष्य मूल्य और कमजोर हो गया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन के अनुसार हत्या बिस्तर पर हुई थी, लेकिन गद्दे, चादर या तकिए पर खून के निशान नहीं मिले। इतना ही नहीं, पुलिस की डिजिटल साक्ष्य संबंधी दलील भी अदालत में टिक नहीं सकी। कॉल डिटेल रिकॉर्ड से यह साबित नहीं हुआ कि मोनिका ने कथित प्रेमी को फोन कर घर बुलाया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दो सह-आरोपियों को पूरी तरह राहत नहीं दी। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के तहत साक्ष्य मिटाने के अपराध में उनकी सजा बरकरार रखी। दोनों आरोपियों को किरण सूर्यवंशी के शव को मोटरसाइकिल पर ले जाते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था, जिससे यह स्पष्ट था कि वे अपराध के सबूत छिपाने का प्रयास कर रहे थे।
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Niteesh Kumarपत्रकार नीतीश कुमार 8 साल से अधिक समय से मीडिया इंडस्ट्री में एक्टिव हैं। जनसत्ता डिजिटल से बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर शुरुआत हुई। लाइव हिन्दुस्तान से जुड़ने से पहले टीवी9 भारतवर्ष और दैनिक भास्कर डिजिटल में भी काम कर चुके हैं। पत्रकार नीतीश कुमार को खबरें लिखने के साथ ग्राउंड रिपोर्टिंग का शौक है। लाइव हिन्दुस्तान यूट्यूब चैनल के लिए लोकसभा चुनाव 2024, दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 और बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की कवरेज कर चुके हैं। फिलहाल लाइव हिन्दुस्तान के लिए नेशनल और इंटरनेशनल सेक्शन की खबरें लिखते हैं। पत्रकार नीतीश कुमार को ब्रेकिंग न्यूज लिखने के साथ खबरों का गहराई से विश्लेषण करना पसंद है। राजनीति से जुड़ी खबरों पर मजबूत पकड़ और समझ रखते हैं। समसामयिक राजनीतिक मुद्दों पर कई सारे लंबे लेख लिख चुके हैं। पत्रकार नीतीश कुमार ने पत्रकारिता का पढ़ाई IIMC, दिल्ली (2016-17 बैच) से हुई। इससे पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी के महाराजा अग्रसेन कॉलेज से पत्रकारिता में ग्रेजुएशन किया। पत्रकार नीतीश कुमार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के रहने वाले हैं। राजनीति, खेल के साथ सिनेमा में भी दिलचस्पी रखते हैं। फिल्में देखना और रिव्यू करना व उन पर चर्चा करना हॉबी है।
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