
दूसरे समुदाय में शादी की तो नहीं दिया बेटी को हिस्सा, सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया पिता का साथ
जस्टिस चंद्रन ने फैसला लिखते हुए कहा, 'साबित हो चुकी वसीयत में दखल नहीं दिया जा सकता है। हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द किया जाता है। यह पाया गया है कि वादी (शायला) का अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है, जो वसीयत के जरिए अन्य भाई-बहनों को दे दी गई है।'
समुदाय से बाहर शादी करने के चलते एक शख्स ने अपनी वसीयत से बेटी को बाहर कर दिया था। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत से भी बेटी को झटका लगा है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि वादी का अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है। साथ ही कहा कि वसीयत लिखने वाले को हम अपनी जगह पर नहीं रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है।
शायला जोसेफ नाम की महिला के 9 भाई-बहन हैं। वह अपने पिता एनएस श्रीधरन की संपत्ति में बराबर का अधिकार मांग रही थीं। जबकि, श्रीधरन ने समुदाय के बाहर शादी करने के चलते शायला को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया था। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच सुनवाई कर रही थी।
जस्टिस चंद्रन ने फैसला लिखते हुए कहा, 'साबित हो चुकी वसीयत में दखल नहीं दिया जा सकता है। हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द किया जाता है। यह पाया गया है कि वादी (शायला) का अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है, जो वसीयत के जरिए अन्य भाई-बहनों को दे दी गई है।'
शायला के वकील पीबी कृष्णन ने बेंच से कहा कि उनका अधिकार 1/9वें हिस्से पर है, जो संपत्तियों का बहुत छोटा सा हिस्सा है। इस पर बेंच ने कहा कि एक व्यक्ति की अपनी संपत्ति के बंटवारे को लेकर इच्छा में समानता के अधिकार का सवाल नहीं आता है।
कोर्ट ने कहा, 'हम समानता पर नहीं हैं और वसीयत लिखने वाले की इच्छा को प्राथमिकता दी जाएगी। वसीयत लिखने वाले की आखिरी वसीयत से भटका नहीं जा सकता और उसे नाकाम नहीं किया जा सकता।' शीर्ष न्यायालय ने शायला के भाई-बहनों की अपील को स्वीकार कर दिया और उस मुकदमे को खारिज कर दिया, जिसमें वह पिता की संपत्ति में बराबर हिस्सा चाह रही थीं।
कोर्ट ने कहा कि वसीयत में लिखी बातों पर सावधानी की नियम लागू नहीं कर सकते, जो की ऐसे व्यक्ति ने लिखी है जिसका अपनी संपत्ति के बंटवारे पर पूरा अधिकार है। बेंच ने कहा कि अगर सभी भाई-बहनों को वसीयत के जरिए बेदखल कर दिया जाता, तो अदालतों की तरफ से सावधानी का नियम लागू किया जा सकता था।
शायला को संपत्ति में हिस्सा क्यों नहीं दिया गया, इस पर कोर्ट ने कहा, '...हम वसीयत लिखने वाले को अपनी जगह पर रखकर नहीं देख सकते...। हम वसीयत लिखने वाले की जगह अपने विचार नहीं थोप सकते है। उसकी इच्छा उसके खुद के तर्कों से प्रेरित थी।'

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Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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