
व्यापारीगण ध्यान दें… चेक बाउंस का केस किस अदालत में हो? सुप्रीम कोर्ट का आया बड़ा फैसला
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने चेक बाउंस के एक मामले में दायर कुछ स्थानांतरण याचिकाओं पर विचार करते हुए इस कानूनी उलझन का समाधान किया।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में शुक्रवार को कहा कि चेक बाउंस का मामला केवल उसी अदालत में दायर किया जा सकता है, जिसके अधिकार क्षेत्र में शिकायतकर्ता का बैंक स्थित हो। आमतौर पर, विवाद उस अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर होता है, जहां परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामले दायर किए जाने होते हैं। अधिनियम की धारा 138 खाते में अपर्याप्त धनराशि के कारण चेक बाउंस होने से संबंधित है।
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने चेक बाउंस के एक मामले में दायर कुछ स्थानांतरण याचिकाओं पर विचार करते हुए इस कानूनी उलझन का समाधान किया। पीठ ने कहा, ‘‘उपरोक्त चर्चा के मद्देनजर, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी खाते के माध्यम से वसूली के लिए दिए गए चेक के संबंध में धारा 138 के तहत दायर शिकायत पर सुनवाई का अधिकार उस अदालत को होगा, जिसके क्षेत्राधिकार में उस बैंक की शाखा आती है जहां राशि प्राप्त करने वाले का खाता हो।
याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में अधिवक्ता कौस्तुभ शुक्ला के माध्यम से शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। बेंच ने जय बालाजी इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अन्य बनाम मेसर्स एचईजी लिमिटेड (2025 आईएनएससी 1362) मामले में कहा कि योगेश उपाध्याय बनाम अटलांटा लिमिटेड (2023) में सुप्रीम कोर्ट का पहले का फैसला गलत है क्योंकि इसमें कानूनी स्कीम और एनआई एक्ट के सेक्शन 142(2)(ए) के एक्सप्लेनेशन पर विचार नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट भोपाल के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) की कोर्ट में पेंडिंग एक कंप्लेंट को कोलकाता के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (MM) को ट्रांसफर करने की मांग वाली ट्रांसफर पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (अमेंडमेंट) एक्ट, 2015 के बाद जूरिस्डिक्शन के बारे में लीगल स्थिति का एनालिसिस किया। उसमें यह नतीजा निकला कि सेक्शन 142(2)(a) के तहत, जूरिस्डिक्शन उस कोर्ट को मिलता है जहां पेई का बैंक अकाउंट है। हालांकि, दशरथ रूपसिंह राठौड़ बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) में सेविंग क्लॉज पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने कोलकाता ट्रांसफर की इजाज़त दे दी क्योंकि कंप्लेंट वापस आने से पहले ही वहां सबूतों की रिकॉर्डिंग शुरू हो चुकी थी।





