'किसी को ऐसे नहीं घोषित कर सकते विदेशी', सुप्रीम कोर्ट ने थोक में रद्द कर दिए हाई कोर्ट के 28 फैसले

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सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के 28 फैसलों को रद्द कर दिया है। इनमें विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा 27 लोगों को विदेशी साबित करने को सही ठहराया गया था । वहीं याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें भारतीय नागरिक होने का सबूत देने का पर्याप्त समय ही नहीं मिला।

'किसी को ऐसे नहीं घोषित कर सकते विदेशी', सुप्रीम कोर्ट ने थोक में रद्द कर दिए हाई कोर्ट के 28 फैसले

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुवाहाटी हाई कोर्ट के 28 फैसले थोक में रद्द कर दिए। इन फैसलों में विदेशी न्यायाधिकरण के उन आदेशों को सही ठहराया गया था, जिसमें 27 लोगों को विदेशी घोषित किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति का निर्धारण एक ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए जो संवैधानिक नियमों एवं कानूनी प्रावधानों के अनुसार निष्पक्ष, वैध और तर्कसंगत हो। सोमवार को सुनाए गए एक फ़ैसले में, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सभी मामलों को नए सिरे से कानूनी रूप से निर्धारित करने के लिए संबंधित विदेशी न्यायाधिकरण को वापस भेज दिया। अदालत ने कहा, 'इसलिए, इन सभी मामलों में हाई कोर्ट द्वारा दिए गए विवादित फ़ैसलों एवं आदेशों को रद्द किया जाता है। संबंधित विदेशी न्यायाधिकरण या पहले के अवैध प्रवासी (निर्धारण) न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए संबंधित विचारों एवं आदेशों को भी रद्द किया जाता है।"

राज्य सरकार को नसीहत

हाई कोर्ट के फैसलों और उनके द्वारा सही ठहराए गए न्यायाधिकरण के आदेशों को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा, 'नागरिकता एवं विदेशी होने का दर्जा संवैधानिक एवं कानूनी रूप से बहुत अहम है। राज्य की यह जायज़ एवं आवश्यक ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि जो लोग कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का दावा करने के हकदार नहीं हैं वे प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करके, झूठे दावे करके या प्रक्रिया में होने वाली देरी का फायदा उठाकर यह दर्जा हासिल न कर सकें।'

याचिकाकर्ता बोले- भारतीय साबित करने का समय ही नहीं मिला

हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि राज्य को यह पक्का करना चाहिए कि इस तरह की स्थिति का फ़ैसला एक ऐसी प्रक्रिया से हो जो निष्पक्ष, कानूनी एवं तर्कसंगत हो। विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा नौ के तहत कानूनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से लागू है।अदालत ने आगे कहा कि मामलों को नए सिरे से विचार के लिए विदेशी न्यायाधिकरण को वापस भेजने का उद्देश उस ज़िम्मेदारी को कम करना नहीं है और न ही इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को कोई फ़ायदा पहुंचाना है जो कानून के अनुसार अपना दावा साबित करने में नाकाम रहा हो। अपीलकर्ताओं की आम शिकायत यह थी कि उन्हें एकतरफ़ा या लगभग एकतरफ़ा कार्यवाही में विदेशी घोषित किया गया जबकि उन्हें उद्धरण का विरोध करने का पूरा एवं सार्थक मौका नहीं दिया गया।

इस मामले पर बात करते हुए अदालत ने कहा, "एक-तरफ़ा कार्यवाही में भले ही अनुपस्थित पक्ष की भागीदारी न हो लेकिन इससे न्यायाधिकरण द्वारा निष्पक्ष विचार एवं सार्थक निर्णय लेने की ज़रूरत खत्म नहीं हो जाती।" अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति, जिस पर विदेशी होने का आरोप है, नोटिस मिलने के बावजूद पेश नहीं होता है, तब भी न्यायाधिकरण (जो एक अर्ध-न्यायिक संस्था है) को स्वतंत्र रूप से यह पक्का करना होगा कि सही प्रक्रिया का पालन किया गया है। उसे राज्य द्वारा पेश किए गए सबूतों की जांच करनी होगी, यह निर्धारित करना होगा कि क्या वे आरोपों का समर्थन करते हैं और किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने से पहले इसके कारण दर्ज करने होंगे।

राज्य द्वारा विदेशी न्यायाधिकरण के सामने पेश की गई सामग्री के निष्पक्ष मूल्यांकन की ज़रूरत पर बल देते हुए, अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि विदेशी घोषित किए जाने का नतीजा कोई ‘मामूली सिविल परिणाम’ नहीं होता, क्योंकि इसके कारण हिरासत में लिया जा सकता है, देश से निकाला जा सकता है, परिवार एवं समुदाय से अलग होना पड़ सकता है, और कुछ मामलों में तो व्यक्ति के पास कोई नागरिकता नहीं रहने की स्थिति भी पैदा हो सकती है।" इस बात पर बल देते हुए कि जिस प्रक्रिया से ऐसी घोषणा की जाती है, उसे निष्पक्षता की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए और उसे ऐसे तथ्यों पर आधारित होना चाहिए जो उस निष्कर्ष को सही ठहरा सकें, फ़ैसले में कहा गया कि इन ज़रूरतों का संवैधानिक आधार भी है।

यह मानते हुए कि अनुच्छेद 14 और 21 सिर्फ़ नागरिकों ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की सुरक्षा करते हैं, शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा, "हो सकता है कि विदेशी न्यायाधिकरण में कार्यवाही का सामना कर रहा कोई व्यक्ति अंततः अपनी भारतीय नागरिकता साबित न कर पाए लेकिन जिस प्रक्रिया से यह तय किया जाता है उसे निष्पक्षता, तर्कसंगतता और मनमानी न होने जैसी संवैधानिक ज़रूरतों को पूरा करना ही चाहिए।"

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Ankit Ojha

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Ankit Ojha

विद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।


राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राज्य और सामाजिक सरोकारों की खबरों के संपादन में लंबा अनुभव होने के साथ ही अपने-आसपास की घटनाओं में समाचार तत्व निकालने की अच्छी समझ है। घटनाओं और समाचारों से संबंधित फैसले लेने और त्वरित समाचार प्रकाशित करने में विशेष योग्यता है। इसके अलावा तकनीक और पाठकों की बदलती आदतों के मुताबिक सामग्री को रूप देने के लिए निरंतर सीखने में विश्वास करते हैं। अंकित ओझा की रुचि राजनीति के साथ ही दर्शन, कविता और संगीत में भी है। लेखन और स्वरों के माध्यम से लंबे समय तक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। इसके अलावा ऑडियन्स से जुड़ने की कला की वजह से मंचीय प्रस्तुतियां भी सराही जाती हैं।


अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।

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