काश जजों की नियुक्ति भी इतनी तेज होती... चुनाव आयुक्तों पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

Devendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने ADR की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अनूप बारनवाल फैसले के बावजूद संसद ने अब तक जरूरी कानून क्यों नहीं बनाया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि काश जजों की नियुक्ति इतनी तेजी से होती।

काश जजों की नियुक्ति भी इतनी तेज होती... चुनाव आयुक्तों पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों की उस विफलता पर तल्ख टिप्पणी की जिसमें उन्होंने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से कार्य करने के लिए आवश्यक कानून बनाने में सालों की देरी की। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अनूप बारनवाल फैसले के बावजूद संसद ने अब तक जरूरी कानून क्यों नहीं बनाया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि काश जजों की नियुक्ति इतनी तेजी से होती।

बारनवाल फैसले की अवहेलना का आरोप

पीठ 2023 के अनूप बारनवाल बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करने का प्रावधान किया गया था। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ को बताया कि हर सरकार ने कानून की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर अपना प्रभाव बनाए रखा। उन्होंने कहा कि विपक्ष में रहते हुए सभी स्वतंत्र संस्थाओं की मांग करते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही इस मुद्दे को भुला देते हैं।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बहुमत की तानाशाही है। जो भी सत्ता में आता है, वही कर रहा है। यह देश के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस दौरान न्यायमूर्ति ने डॉ बीआर आंबेडकर का हवाला देते हुए BBC की एक पुरानी वीडियो का जिक्र किया, जिसमें संविधान लागू होने के महज तीन साल बाद उन्होंने कहा था कि इस देश में लोकतंत्र काम नहीं कर रहा।

2023 कानून को चुनौती

याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देती है। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन करता है तथा अनूप बारनवाल फैसले में दिए गए CJI को शामिल करने के निर्देश की अवहेलना है। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने तर्क दिया कि बारनवाल फैसला केवल अंतरिम व्यवस्था नहीं था, बल्कि उसने संवैधानिक आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था।

विपक्षी सांसदों के निलंबन पर उठा सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने बताया कि जब यह विधेयक संसद में पारित किया गया, तब 141 विपक्षी सांसद निलंबित थे। प्रशांत भूषण ने दावा किया कि कानून बिना किसी सार्थक बहस के 'वॉयस वोट' के जरिए पास कर दिया गया। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा कि स्वतंत्र चुनाव आयोग के बिना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। लोकतंत्र का भविष्य इस मामले पर निर्भर करता है।

न्यायाधीशों की नियुक्ति का जिक्र

सनवाई के दौरान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया का भी जिक्र करते हुए टिप्पणी की कि काश न्यायाधीशों की नियुक्ति में भी उतनी ही तेजी दिखाई जाती, जितनी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में दिखाई गई। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से महज एक दिन पहले तेजी से पूरी कर दी थी।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 14 मई 2026 को होगी।

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लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

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