जमानत का विरोध कर रही थीं महाराष्ट्र और पंजाब की सरकारें, सुप्रीम कोर्ट भड़का, लगा दी फटकार
यह टिप्पणी वर्ष 2022 के एक हत्या के मामले में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार हुए एक विदेशी नागरिक केल्विन चिन्दोजी ओकोरो के मामले में आई है। पीठ ने जमानत का कड़ा विरोध करने लेकिन त्वरित सुनवाई सुनिश्चित न कर पाने के लिए राज्य सरकार की आलोचना की।

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई समय पर पूरी करने में विफल रहने और इसके बावजूद जमानत याचिकाओं का विरोध करने पर पंजाब और महाराष्ट्र की सरकारों की शुक्रवार को फटकार लगाई। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायाधीश शील नागू की पीठ ने मुकदमे के निपटने में अत्यधिक देरी के बावजूद जमानत का विरोध करने के लिए महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की। न्यायाधीशों ने कहा कि आरोपी चार वर्ष से अधिक समय से हिरासत में है, जबकि आरोप पत्र में दर्ज 45 गवाहों में से अब तक केवल दो गवाहों से ही पूछताछ की जा सकी है।
यह टिप्पणी वर्ष 2022 के एक हत्या के मामले में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार हुए एक विदेशी नागरिक केल्विन चिन्दोजी ओकोरो के मामले में आई है। पीठ ने जमानत का कड़ा विरोध करने लेकिन त्वरित सुनवाई सुनिश्चित न कर पाने के लिए राज्य सरकार की आलोचना की। इसके साथ ही महाराष्ट्र सरकार को इस देरी का कारण बताते हुए एक हलफनामा दायर करने और अभियोजन पक्ष की कमियों के कारण होने वाली लंबी कैद को रोकने के लिए एक नीति तैयार करने का निर्देश दिया।
इससे पहले गुरुवार को, इसी पीठ ने पंजाब के एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पर 50 हजार रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया था। हालांकि, पीठ ने निर्देश दिया कि इस जुर्माने की वसूली तब तक स्थगित रहेगी जब तक कि राज्य सरकार इस मामले में अपना जवाब दाखिल नहीं कर देती।
अभद्र व्यवहार पर याचिकाकर्ता को अदालत कक्ष से निकाला गया
वहीं, एक अन्य नाटकीय घटनाक्रम में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपनी याचिका पर सुनवाई के दौरान, अपना पक्ष रख रहे एक याचिकाकर्ता को शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय से जबरदस्ती बाहर निकाल दिया गया। उसपर आरोप है कि उसने अदालत में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और अपने कानूनी दस्तावेज फेंक दिए। यह घटना शुक्रवार को आंशिक कार्यदिवस के दौरान न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता ने असामान्य रूप से आक्रामक रुख अपनाया।
काले कोट में, लेकिन वकीलों वाला बैंड पहने बिना अदालत में पेश हुए याचिकाकर्ता ने पीठ को संबोधित करते हुए कहा, ''न्यायिक सेवक महोदय, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एसीपी (अतिरिक्त पुलिस आयुक्त) के ख़िलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दें।'' न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन ने हैरानी जताते हुए कहा, ''आप हमें आदेश दे रहे हैं?''


