सुपर अल नीनो की दस्तक से भारत में मचेगा हाहाकार! गरमी का तांडव, बारिश को तरस जाएंगे लोग
अल नीनो अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना है। इस दौरान प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म होने लगता है। इसकी वजह से मॉनसून प्रभावित होता है और सूखे जैसे हालात बन सकते हैं।

प्रशांत महासागर में दशकों में सबसे भीषण अल नीनो ने पूरी तरह से दस्तक दे दी है। इसे लेकर WMO ने अपने 50 साल के इतिहास में पहली बार बेहद सख्त चेतावनी जारी की है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक 2026 के अंत तक यह सुपर अल नीनो बेहद खतरनाक रूप ले लेगा। वहीं इसका असर फरवरी 2027 तक जारी रहने की लगभग 100 फीसदी संभावना जताई गई है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक भारत पर अल नीनो तात्कालिक असर भले ही कम दिखे, लेकिन असली मुसीबत 2027 में दस्तक देगी। अगले साल के शुरुआती महीनों में और उसके बाद मॉनसून से पहले अल नीनो भारत में हाहाकार मचा सकता है। देश भर में ना सिर्फ कम बारिश की वजह से सूखे जैसे हालात बन सकते हैं, बल्कि फसलों की बुवाई भी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। इससे मंहगाई बढ़ने का भी खतरा है।
भारत पर अल नीनो का कैसा होगा असर?
अल नीनो भारत में कमजोर मॉनसून का कारण रहा है। इस साल अगस्त में देश में 16 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। अगले साल अगर सुपर अल नीनो ने उत्पात मचाया और बारिश कम हुई तो खरीफ फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ सकता है। स्काईमेट के वाइस प्रेसिडेंट महेश पलावत के अनुसार अल नीनो से मॉनसून बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। इसकी वजह से इस साल सामान्य से अधिक गर्म सर्दियां भी देखने को मिल सकती हैं।
पलावत के मुताबिक, “अगर अल नीनो 2027 की शुरुआत तक बना रहता है, तो भारत में मॉनसून से पहले का मौसम सामान्य से कहीं ज्यादा गर्म हो सकता है और भीषण हीटवेव का खतरा बढ़ जाएगा। हालांकि सिर्फ एल नीनो ही भारत का मौसम तय नहीं करता। हिंद महासागर डाइपोल (IOD), हिमालय में बर्फ की स्थिति, समुद्र की स्थानीय सतह का तापमान और दूसरे कारक भी यह तय करेंगे कि भारत पर इसका असर कितना और कैसा होगा।”
जब-जब अल नीनो आया, सूखे के हालात
इतिहास उठाकर देखें तो हर बड़े अल नीनो के अगले साल भारत में जानलेवा लू चली है। 1997 के अल नीनो के बाद राजस्थान के धौलपुर में तापमान 49.5°C पहुंच गया था। इस दौरान देशभर में 3,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। वहीं 2009 के अल नीनो के बाद 2010 में भीषण गर्मी पड़ी और अहमदाबाद में 1,200 से अधिक लोगों की मौतें हुईं। इसके बाद 2015 में आते अल नीनो के बाद तो राजस्थान के फलोदी में देश का इतिहास का सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया था। तब पारा 51.0 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया था। वहीं 2023 के अल नीनो के बाद 2024 में चूरू में पारा 50.5°C पहुंच गया।
हर अल नीनो लाता है सूखा?
ICRIER और 'साइंस' जर्नल के अध्ययनों के मुताबिक, पिछले 35 सालों में भारत में पड़ा हर सूखा अल नीनो साल में ही आया है। हालांकि, 1950 के बाद से आए 23 अल नीनो में से केवल 11 बार ही भारत में सूखा पड़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह इंडियन ओशन डायपोल (IOD) है। IOD को हिंद महासागर का तापमान संतुलन माना जाता है। जब IOD 'पॉजिटिव' होता है, तो यह भारत में बारिश बढ़ाता है और अल नीनो के असर को बेअसर कर देता है। 1997 में इसका उदाहरण देखने को मिला था। इस साल सदी का सबसे मजबूत अल नीनो आने के बावजूद रिकॉर्ड पॉजिटिव IOD के कारण भारत में मॉनसून सामान्य रहा था।
फसलों पर गहरा सकता है संकट
अल नीनो के कारण उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान भी तापमान बढ़ जाता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के मुताबिक उत्तर भारत में फरवरी का महीना हर दशक में लगभग 0.69°C तेजी से गर्म हो रहा है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, तापमान में मात्र 1°C की बढ़ोतरी से गंगा तटों के मैदानी इलाकों में 40 से 50 लाख टन गेहूं का उत्पादन खतरे में पड़ जाता है। अगर 2027 की शुरुआत में फरवरी और मार्च अधिक गर्म रहते हैं, तो गेहूं की फसल समय से पहले पक जाएगी और पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।


