ये तो संविधान के खिलाफ है... छात्रों को दंड तो दूर, धमका भी नहीं सकते: SC जज की दो टूक
जस्टिस भुइयां की ये टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब NLSIU ने CJI सूर्य कांत की भागीदारी पर छात्रों की आपत्ति के बाद दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया था, और BCI ने NALSAR के छात्रों का एनरोलमेंट रोकने की कोशिश की थी।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को साफ शब्दों में कहा कि अलग राय रखने या सवाल पूछने वाले छात्रों को दंडात्मक कार्रवाई की धमकी नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा रवैया असंवैधानिक है और सत्ता का दुरुपयोग है। उन्होंने दो टूक लहजे में कहा कि सिर्फ इसलिए छात्रों को धमकी नहीं दी जा सकती या उन पर सजा वाली कार्रवाई नहीं की जा सकती कि उनकी राय अधिकारियों या सत्ता में बैठे लोगों से अलग है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सवाल पूछने का अधिकार लोकतांत्रिक नागरिकता का अहम हिस्सा है।
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के LLM दीक्षांत समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “लोकतंत्र में, सवाल पूछने का अधिकार बगावत नहीं है। यह नागरिकता, आजादी और संवैधानिक जिम्मेदारी का एक जरूरी इजहार है।” उन्होंने कहा, “जब छात्र कोई अलग राय रखते हैं या सवाल पूछते हैं, तो उन्हें धमकाया नहीं जा सकता। उन्हें सज़ा देने की धमकी नहीं दी जा सकती। यह असंवैधानिक है। यह सत्ता और पद का दुरुपयोग है।”
क्यों और किस प्रसंग में आया बयान
जस्टिस भुइयां का यह बयान हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ में हुए विवाद के बीच आया है, जहाँ छात्रों ने यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्य कांत के शामिल होने पर आपत्ति जताई थी। यह आपत्ति छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा पर CJI की टिप्पणियों को लेकर की गई थी। इतना ही नहीं छात्रों द्वारा CJI का विरोध करने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने NALSAR के छात्रों का एनरोलमेंट रोकने की कोशिश की थी।
BCI ने भी की थी दंडात्मक कोशिश
यह विवाद तब और बढ़ गया जब BCI ने शुरू में निर्देश दिया कि छात्रों के अभियान की जांच पूरी होने तक स्टेट बार काउंसिल NALSAR के 2026 बैच के ग्रेजुएट का एनरोलमेंट न करें। काफी विरोध के बाद, BCI ने वह पत्र वापस ले लिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने BCI के इस कदम पर सवाल उठाए और निर्देश दिया कि छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। बाद में यह विवाद बेंगलुरु की नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी तक भी पहुँच गया, जब यूनिवर्सिटी के 2026 के दीक्षांत समारोह में CJI और BCI चेयरमैन के प्रस्तावित शामिल होने पर वहां से पास होने वाले छात्रों ने आपत्ति जताई।
असहिष्णु सोच भारतीय संविधान की भावना के खिलाफ
लाइव लॉ के मुताबिक, अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने कहा कि यूनिवर्सिटी ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ स्थापित विचारों की जाँच और उन पर सवाल उठाए जा सकें और असहमति को दुश्मनी की नज़र से न देखा जाए। सुप्रीम कोर्ट के जज नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के पोस्ट-ग्रेजुएट छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे। जस्टिस भुइयां ने ज़ोर देकर कहा कि यूनिवर्सिटी ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ आज़ादी से सोचने की आदत शुरू हो और छात्र मुश्किल सवाल पूछने में हिचकिचाएँ नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि सवाल पूछना कोई बगावत नहीं है और "असहिष्णु सोच" भारतीय संविधान की भावना के खिलाफ है।
सहनशीलता एक संवैधानिक मूल्य
उन्होंने कहा कि सहनशीलता एक 'संवैधानिक मूल्य' है और बुद्ध और गांधी की धरती होने के नाते, भारत में असहिष्णु सोच के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि यह हिंसा का ही एक रूप है। उन्होंने कहा, “हमारा संविधान बोलने, सोचने और अलग-अलग विचार रखने की आज़ादी की रक्षा करता है। असहिष्णुता उस ढांचे को तब कमज़ोर करने लगती है जब असहमति या विरोध को विचारों का जायज़ अंतर नहीं, बल्कि ऐसी चीज़ माना जाता है जिसे दबाया, नकारा या जिसके लिए सज़ा दी जानी चाहिए। इसलिए, असहमति के साथ रहने की क्षमता सिर्फ एक सामाजिक गुण नहीं है। यह एक उदार संवैधानिक लोकतंत्र का मूल आधार है।” जस्टिस भुइयां ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कानूनी पेशेवरों और विद्वानों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि असहमति के समय भी आज़ादी, समानता, सम्मान और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य कानून की समझ के केंद्र में बने रहें।


