बंद है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, लेकिन भारत को कच्चा तेल भेज रहा है ईरान; 7 साल बाद आएगी पहली खेप
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का भी अहम महत्व है, जहां से दुनिया के लगभग 20% तेल और गैस का परिवहन होता है। युद्ध के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर है। करीब सात साल बाद ईरान का कच्चा तेल लेकर एक टैंकर भारत की ओर बढ़ रहा है। वेसल ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, ‘पिंग शुन’ नामक तेल टैंकर गुजरात के वादिनार वाडीनार बंदरगाह की ओर बढ़ रहा है। इस टैंकर में लगभग 6 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल लदा है, जिसे 4 मार्च के आसपास ईरान के प्रमुख तेल टर्मिनल खर्ग द्वीप से लोड किया गया था। इसके 4 अप्रैल को वडीनार पहुंचने की संभावना है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किस भारतीय रिफाइनरी द्वारा इस तेल का उपयोग किया जाएगा।
आपको बता दें कि अमेरिका ने 21 मार्च को एक महीने के लिए ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है। यह छूट विशेष रूप से उन तेल खेपों पर लागू होती है जो पहले से टैंकरों में लदी हुई हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाना और तेजी से बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना है।
यह कदम भारत के लिए अवसर साबित हो सकता है। कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म क्लेपर के विश्लेषक सुमित रितोलिया के अनुसार, “भारत-ईरान तेल व्यापार फिर से जीवित होता दिख रहा है। यह डिलीवरी ऐसे समय में हो रही है जब भारतीय रिफाइनरियों के पास भंडार कम हो रहा है।”
गौरतलब है कि भारत ने 2019 में अमेरिकी प्रशासन द्वारा लगाए गए सख्त प्रतिबंधों के बाद ईरान से तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया था। इससे पहले ईरान भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था। हालांकि, इस संभावित सौदे के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या भुगतान तंत्र को लेकर है, क्योंकि ईरान अभी भी श्विफ्ट प्रणाली से बाहर है। पहले यूरो में भुगतान की व्यवस्था थी, लेकिन प्रतिबंधों के बाद वह भी बंद हो गई।
वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो ईरानी तेल पहले से ही बाजार में मौजूद है, क्योंकि इसका अधिकांश निर्यात चीन को होता रहा है। ऐसे में अमेरिकी छूट से आपूर्ति में सीधी बढ़ोतरी तो नहीं होगी, लेकिन भारत सहित अन्य देशों को खरीद का अवसर जरूर मिलेगा।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का भी अहम महत्व है, जहां से दुनिया के लगभग 20% तेल और गैस का परिवहन होता है। युद्ध के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है। भारत के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का करीब 88% आयात करता है, ऐसे में हर अतिरिक्त बैरल का महत्व बढ़ जाता है। जैसे भारत ने हाल के महीनों में रूस से तेल आयात बढ़ाया है, वैसे ही वह ईरान से भी अवसर का लाभ उठा सकता है।
इतिहास पर नजर डालें तो 2016 में प्रतिबंध हटने के बाद भारत ने ईरान से आयात तेजी से बढ़ाया था और वह देश का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया था। लेकिन 2019 में प्रतिबंधों की वापसी के बाद यह व्यापार पूरी तरह ठप हो गया।
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