आठ माह में नशे के शिकार 176 नये युवा मरीज चिन्हित
गांजा व हेरोइन जैसी नशीली पदार्थों के शिकार युवा मनोरोग से पीड़ित हो रहे हैं। नशे की तलब में घर का सामान बेचने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। सदर अस्पताल में बढ़ती काउंसिलिंग की संख्या बताती है कि युवाओं में रक्तदोष, खून की कमी, और मानसिक विकृति जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

गांजा व हेरोइन जैसे नशीले पदार्थ के शिकार युवाओं से परिजन हैं त्रस्त, सस्ते में बेच दे रहे हैं घर का कीमती सामान बोनफिक्स की गंध लेकर अवसाद के शिकार युवा आ रहे काउंसिलिग कराने पीड़ित युवाओं में रक्तदोष, खून की कमी, चर्म रोग की मिल रही है शिकायत किस वर्ष कितने मिले अवसाद व नशा के मरीज वर्ष अवसाद के मरीज नशा के मरीज 2023 416 120 2024 641 250 2025 488 176 2026 अगस्त तक 238 176 (पेज तीन की लीड खबर) भभुआ, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। कैमूर जिले के युवा नशे की लत से मनोरोग से पीड़ित हो रहे हैं। बोनफिक्स की गंध लेने से वह अवसाद के शिकार हो रहे हैं। ऐसे युवा सदर अस्पताल के जिला मानसिक स्वास्थ्य इकाई में काउंसिलिग कराने के लिए आ रहे है। जिले में गांजा व हेरोइन जैसे मादक पदार्थों के शिकार युवाओं से परिजन भी त्रस्त हैं। जब इन्हें नशे की तलब लगती है और जेब में पैसे नहीं होते हैं, तब वह घर का सामान उठाकर सस्ते में बेच दे रहे हैं। इन युवाओं का स्वास्थ्य परीक्षण करने से इनमें रक्तदोष, खून की कमी, चर्म रोग की शिकायत मिल रही है।
सदर अस्पताल की युवा काउंसिलिंग
सदर अस्पताल जिला मानसिक स्वास्थ्य इकाई की क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट भावना गुप्ता ने बताया कि केन्द्र में प्रतिदिन 25 से 30 मरीज आते हैं। सोमवार व गुरुवार को लगभग 50 मरीज आते हैं, जिनकी काउंसिलिंग की जाती है। वर्ष 2026 के अगस्त माह तक अवसाद के 238 मरीज व नशा सेवन के 176 युवा और वर्ष 2025 में अवसाद के 488 मरीज व नशा सेवन करने वाले 176 युवाओं की काउंसिलिंग की गयी। इन्हें मनोवैज्ञानिक उपचार करते हुए चिकित्सकीय सलाह दी गई। उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य इकाई में हर उम्र के नशा से ग्रसित रोगी आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि इन रोगियों में वैसे बच्चे शामिल हैं, जिन्हें जुआ खेलने और मोबाइल से पैसा वाला गेम खेलने की लत लगी है। यहां आने वाले अधिकतर बच्चे व युवा बोनफिक्स, व्हाइट स्प्रीट, ताड़ी, गांजा, हेरोइन सहित अन्य तरह का नशा कर रहे हैं। इस कारण पहले व्यवहारिक समस्या शुरू होते-होते मानसिक समस्या बढ़ती जा रही है। काउंसिलिंग से यह पता चला है कि नशा करने वाले युवा व बच्चों में चोरी करने, झूठ बोलने, अपराध करने, परिवार से अलग रहने की इच्छा पाले रह रहे हैं। इससे उनमें मानसिक विकृति तेजी से बढ़ रही है।
परिजनों की चिंता
क्या कहते हैं परिजन जिले के रामपुर प्रखंड से अपने बच्चे को लेकर सोमवार को काउंसिलिंग कराने आए पिता ने दु:खी मन से कहा कि उनका बेटा स्नातक पास है। पढ़ने में तेज है। जब तक यहां रहा नशा से दूर रहा। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए उसे पिछले वर्ष बनारस भेजे थे। वहां उसकी संगत गलत लोगों से हो गई। वहीं पर वह नशा करने लगा। हर माह जरूरत से ज्यादा पैसा मांगने लगा। जब वहां जाकर पांच दिन रहे तो उसकी गतिविधि का पता चला। फिर वहां से उसे लेकर गांव आ गए। दो माह से यहां काउंसिलिंग करा रहा हूं। सुधार है। हमलोग उसके साथ-साथ रहते हैं, ताकि नशा नहीं कर सके। नशा से बदल जाती है मानसिक स्थिति मानसिक स्थिति को बदल देनेवाले रसायन, जो किसी को नींद या नशे की हालत में ला दे, उन्हें नारकॉटिक्स या ड्रग्स कहा जाता है। मॉर्फिन, कोडेन, मेथाडोन, फेंटाइनाइल आदि इस कैटिगरी में आते हैं। नारकॉटिक्स पाउडर, टैबलेट और इंजेक्शन के रूप में आते हैं। ये दिमाग और आसपास के टिशू को उत्तेजित करते हैं। डॉक्टर कुछ नारकॉटिक्स का इस्तेमाल किसी मरीज को दर्द से राहत दिलाने के लिए करते हैं। लेकिन, कुछ लोग इसका इस्तेमाल नशा के लिए करते हैं, जिसकी उन्हें लत लग जाती है।
नशेड़ियों की पहचान
नशेड़ियों की ऐसे करें पहचान अगर किसी की आंखें लाल है, जुबान तुतला रही हो, पसीना आ रहा हो, गुस्सैल या अतिरिक्त खुशी जता रहा हो, पैर लड़खड़ा रहा हो, भूख कम लग रही हो तो ऐसे लोग नशेड़ी हो सकते हैं। सेवन करने के लिए नशीला पदार्थ नहीं मिलने पर घबराहट होने लगती है, उबासी आना, लूज मोशन, दौरे पड़ना इसके लक्षण हैं। नशे की लत लग जाने के बाद पैसों की मांग बढ़ जाती है। पुराने दोस्त छोड़ नए दोस्त बनने लगते हैं। अकेला रहने की कोशिश करते हैं। घरों में नई किस्म की दवाएं या खाली इंजेक्शन मिलने लगता है।
युवाओं की सुरक्षा के उपाय
युवाओं को नशा से बचाव क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट ने बताया कि युवाओं को नशा से बचाव में परिवार की अहम भूमिका होती है। उन्होंने सलाह दी कि बच्चों का बेहतर ख्याल रखे, उनकी गलत आदतों पर निगरानी रखें। आवश्यकता से ज्यादा पैसा नहीं दें। उनकी रुची साकारात्मक कार्यों में विकसित करें। कोट सदर अस्पताल की जिला मानसिक स्वास्थ्य इकाई में आने वाले नशा के शिकार युवाओं का मनोवैज्ञानिक उपचार करते हुए चिकित्सकीय सलाह दी जाती है। इससे उनके स्वास्थ्य में काफी सुधार आता है। मरीज को मानसिक मजबूती के लिए उन्हें मनोवैज्ञानिक उपचार दिया जाता है। भावना गुप्ता, क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट फोटो- 7 सितंबर भभुआ- 4 कैप्शन- भभुआ शहर के अखलासपुर बस पड़ाव के यात्री में बैठकर हेरोइन पीता युवक।


