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OBC का सर्वे क्यों चाह रही BJP, चिंता या चतुराई; वोट बैंक में सेंधमारी का क्या गेमप्लान?

OBC Survey Game Plan: जस्टिस रोहिणी आयोग ने OBC के 27% आरक्षण को चार-श्रेणियों में बांटने का फॉर्मूला प्रस्तावित किया है। माना जाता है कि उसकी सिफारिशों से OBC के भीतर के प्रभावशाली वर्ग का लाभांश घटक

OBC का सर्वे क्यों चाह रही BJP, चिंता या चतुराई; वोट बैंक में सेंधमारी का क्या गेमप्लान?
Pramod Kumarप्रमोद प्रवीण, लाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीThu, 09 Nov 2023 03:13 PM
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केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को आगामी चुनावों खासकर लोकसभा चुनावों में पिछड़ी जाति के वोट परसेंट में कमी आने की आशंका घर कर रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल जाति जनगणना का दांव चल पिछड़े तबके का वोट अपने पाले में करने की कोशिशों में जुटे हैं। बिहार की नीतीश-तेजस्वी सरकार ने इस दिशा में दो कदम आगे बढ़ा दिया है। वहां न सिर्फ जाति जनगणना हुई बल्कि उसके आंकड़ों के आधार पर 75 फीसदी तक आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मंजूरी कैबिनेट दे चुकी है। 

आज बिहार विधानसभा में आरक्षण बढ़ाने का बिल भी पास हो गया है। बिल में अत्यंत पिछड़ा वर्ग को 25 फीसदी, पिछड़ा वर्ग को 18 फीसदी (कुल OBC को 43 फीसदी), अनुसूचित जाति को 20 फीसदी, अनुसूचित जन जाति को 2 फीसदी और EWS को 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान है।

BJP का फोकस सिर्फ OBC सर्वे पर क्यों
यह बात सर्वविदित है कि 1990 के दशक में बिहार और उत्तर प्रदेश में जनता दल, समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों ने पिछड़ी जातियों की लामबंदी के बल पर न सिर्फ चुनाव जीता बल्कि लंबे समय तक वे सत्ता पर काबिज रहीं। बिहार में लालू-राबड़ी ने 15 वर्षों तक शासन किया, जबकि उसके बाद से नीतीश कुमार लगातार (कुछ महीनों को छोड़कर) राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। कभी बीजेपी के साथ गठबंधन कर तो कभी राजद के साथ गठबंधन कर। राजद और जदयू के गठबंधन और अब लोकसभा चुनावों के लिए INDIA महागठबंधन ने जातीय गोलबंदी को और हवा दी है। 

तेजी से बदला है OBC वोटरों का मूड
कहना ना होगा कि हाल की राजनीतिक कोशिशों से पिछड़ी जातियों की गोलबंदी तेजी से हुई है, जो बीजेपी के लिए चिंता का कारण बन रही है। 2014 में जब बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई तो उसमें भी पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही थी। 2019 के चुनावों में भी पिछड़े वर्ग ने बीजेपी का खूब साथ दिया लेकिन बिहार में जातीय गणना और गैर बीजेपी शासित राज्यों खासकर  झारखंड, कर्नाटक और तमिलनाडु में बढ़ाई गई ओबीसी आरक्षण की सीमा ने फिर से पिछड़ा वर्ग को बीजेपी से दूर करना शुरू कर दिया है, जो उसके लिए बड़ी चिंता है।

10 वर्षों के आंकड़ों में देखें OBC का क्या रुख?
CSDS के आंकड़ों के मुताबिक, 2009 के चुनाव में जहां 22 फीसदी OBC मतदाताओं ने बीजेपी को वोट दिया था, वह 2014 में बढ़कर 34 और 2019 में 44 फीसदी तक पहुंच गया। कांग्रेस को 2009 में सिर्फ 24 फीसदी ओबीसी वोट मिले थे, जो 2014 और 2019 में घटकर 15-15 फीसदी रह गए।  ओबीसी समुदाय ने क्षेत्रीय पार्टियों को 2009 में 54 फीसदी वोट दिए थे, जो 2014 में 51 और 2019 में घटकर 41 फीसदी रह गया। 

BJP की चिंता क्या?
यह स्पष्ट है कि बीजेपी की जीत में ओबीसी वोट बैंक ने अहम भूमिका निभाई थी। इसमें बीजेपी और संघ की वह नीति सफल रही जिसके जरिए नरेंद्र मोदी को (एक पिछड़े वर्ग के नेता को) प्रधानमंत्री पद के लिए नामित किया गया था। अब, जब मोदी सरकार के 10 साल होने को हैं, तब एंटी इनकमबेंसी फैक्टर के अलावा मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई फिर से तेज हो गई है। बीजेपी को यही चिंता है कि कहीं कमंडल पर मंडल का दांव भारी न पड़ जाए? क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी के वोट परसेंट में बड़ी गिरावट आ सकती है, जो उसे केंद्र समेत कई राज्यों की सत्ता से दूर कर सकती है। बीजेपी को 2019 में कुल 37.4 फीसदी और 2024 में 31.1 फीसदी वोट मिले थे।

बीजेपी का गेम प्लान क्या?
देश में इस समय ओबीसी की आबादी कितनी है, इसका आंकड़ा नहीं है। ओबीसी सर्वे से यह रहस्य साफ हो सकता है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट में इसकी आबादी 52 फीसदी बताई गई थी, जबकि दावे किए जाते रहे हैं कि ओबीसी आबादी 60 फीसदी से ज्यादा है। बिहार की जातीय गणना के आंकड़ों से साफ हो गया है कि वहां अति पिछड़ी जाति की आबादी 36 फीसदी है, जबकि पिछड़ी जाति की आबादी 27 फीसदी है। दोनों की कुल आबादी 63 फीसदी है। यादव को छोड़ दें तो करीब सभी ओबीसी जातियों का कमोबेश वोट बीजेपी को मिलता रहा है। कई इलाकों में यादव भी बीजेपी के कोर वोटर रहे हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा और बीजेपी के पक्के वोटर अति पिछड़ी जातियां रही हैं, जिनमें नाई, कहार, कुम्हार, लोहार, नोनिया, तेली, कानू, धानुक, बढ़ई, कश्यप, केवट, मल्लाह, साहनी, निषाद, रायकवार, धीवर, बिंद, धीमर, बाथम, तुरहा, गोड़िया आदि शामिल हैं। 

नीतीश-लालू से आगे सोच रही बीजेपी
जिस तरह नीतीश कुमार ने EBC कैटगरी अलग कर लालू के वोट बैंक में सेंधमारी की है और अपना एक विश्वस्त वोट बैंक बनाया है, उसी तरह बीजेपी जातीय गणना की काट में सिर्फ ओबीसी सर्वे कराकर सभी राज्यों के अंदर उस EBC कैटगरी पर फोकस करना चाहती है, जो परंपरागत रूप से किसी भी एक दल का एकमुश्त वोटर नहीं रहा है। 2014 में 42 फीसदी EBC ने बीजेपी को वोट दिया था, जबकि अन्य पिछड़ी जातियों का 30 फीसदी वोट ही बीजेपी को मिला था। 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर क्रमश: 48 और 41 फीसदी हो गया था। बीजेपी की कोशिश है कि जब ओबीसी सर्वे के बाद सभी पिछड़ी जातियों का सामुदायिक प्रतिनिधित्व उजागर हो जाय, तब केंद्रीय स्तर पर मिलने वाले OBC आरक्षण के अंदर कोटा सिस्टम लागू कर EBC को अपने पाले में किया जाय।

जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट अभी भी सरकार के पास पड़ी है। उसे ना तो संसद में पेश किया गया है, न उस पर कोई ऐक्शन हुआ है। माना जाता है कि उसमें EBC कैटगरी के समूहों के लिए अलग से आरक्षण की सिफारिश की गई है। जस्टिस रोहिणी आयोग ने OBC के 27% आरक्षण को चार-श्रेणियों में बांटने का फॉर्मूला प्रस्तावित किया है। माना जाता है कि उसकी सिफारिशों से ओबीसी के भीतर के प्रभावशाली वर्ग का लाभांश कम हो सकता है, जबकि कमजोर लोगों कोअलग कोटा मिलने से लाभ मिल सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी और क्षेत्रीय दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि ओबीसी वोट बैंक में बिखराव का मतलब बीजेपी को सीधा लाभ हो सकता है।

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