राहत : थोक महंगाई नौ महीने बाद पहली बार घटी
शोल्डर :: ईंधन की कीमतों में नरमी का दिखा असर, जुलाई में जुलाई

ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में नरमी के बीच थोक महंगाई नौ महीने में मासिक आधार पर पहली बार घटकर जुलाई में 9.78 प्रतिशत रही। शुक्रवार को आधिकारिक आंकड़ों में यह जानकारी दी गई। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित थोक मुद्रास्फीति जून के महीने में 9.87 प्रतिशत रही थी। अक्तूबर 2025 के बाद पहली बार थोक महंगाई में मासिक आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। जुलाई में गिरावट मुख्य रूप से ईंधन एवं बिजली क्षेत्र की कीमतों में कमी के कारण आई, जबकि प्राथमिक वस्तुओं और विनिर्मित उत्पादों की महंगाई बढ़ी।
सरकार के नए आंकड़े
सरकार के नए आधार वर्ष 2022-23 पर आधारित थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आंकड़ों के तहत पहली बार मुद्रास्फीति में मासिक आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। पश्चिम एशिया में युद्ध और इसके कारण होर्मुज जलडमरूमथ में अवरोध से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और उर्वरक की लागत बढ़ी। इसका असर खाद्य कीमतों पर भी पड़ा। भारत अपने अधिकतर कच्चे तेल का आयात इसी रास्ते से करता है। इससे चालू वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत से थोक महंगाई लगातार बढ़ती रही। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने शुक्रवार को मासिक थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आंकड़े जारी करते हुए कहा कि जुलाई 2026 में खनिज तेल (पेट्रोलियम उत्पादों सहित), खाद्य वस्तुएं, बुनियादी धातुओं का विनिर्माण, गैर-खाद्य वस्तुएं, खाद्य उत्पादों का विनिर्माण, रसायनों एवं रासायनिक उत्पादों का विनिर्माण थोक मुद्रास्फीति के प्रमुख कारक रहें।
ईंधन की कीमतों में नरमी से राहत
ईंधन एवं बिजली क्षेत्र की महंगाई जुलाई में घटकर 20.05 प्रतिशत रह गई, जो जून में 27.41 प्रतिशत थी। खाद्य वस्तुओं की महंगाई भी मामूली घटकर 5.44 प्रतिशत रही, जो जून में 5.49 प्रतिशत थी। हालांकि, विनिर्मित उत्पादों की महंगाई जुलाई में बढ़कर 8.29 प्रतिशत हो गई, जो जून में 7.48 प्रतिशत थी। आंकड़ों के मुताबिक, उत्पादन उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) में जुलाई में सालाना आधार पर 9.6 प्रतिशत की महंगाई रही, जो जून के समान स्तर पर है। सरकार ने कहा है कि पीपीआई करीब पांच साल में डब्ल्यूपीआई की जगह ले लेगा। उत्पादन पीपीआई में विनिर्माण और खनन क्षेत्र की महंगाई कम हुई, लेकिन कृषि और बिजली क्षेत्र में महंगाई बढ़ने से इसका असर निष्प्रभावी हो गया。
थोक महंगाई का असर
थोक में वस्तुओं के दाम कम होने से इसका असर खुदरा महंगाई पर दिखता है। आरबीआई मौद्रिक नीति तैयार करते समय मुख्य रूप से खुदरा मुद्रास्फीति पर गौर करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक थोक महंगाई का असर उपभोक्ताओं तक पहुंचने में एक से डेढ़ माह तक का समय लगता है। इसमें उत्पादन से लेकर परिवहन और भंडारण तक का समय होता है। ऐसे में यदि थोक महंगाई में नरमी आती है तो इसका मतलब है कि आने वाले डेढ़-दो माह में खुदरा महंगाई भी घटेगी। इस तरह थोक मुद्रास्फीति खुदरा महंगाई में बदलाव का पहले संकेत दे देती है।
महंगाई का आप पर असर
-महंगाई दर बढ़ने या घटने का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है
- थोक में अगर किसी वस्तु के दाम घटते हैं तो आम उपभोक्ता को खुदरा बाजार में खरीद के दौरान कम कीमत चुकानी होती है।
- औसतन महंगाई घटने से रिजर्व बैंक के ऊपर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव घटेगा।
- ब्याज दरें कम होने के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को कर्ज कम महंगा मिलेगा।
- किसी देश में महंगाई दर घटने पर मुद्रा के माध्यम से खरीदने की ताकत बढ़ती है। उससे देश विशेष में रहने का खर्च घटता है।
- खरीद शक्ति बढ़ने से उत्पादन भी बढ़ता है जो अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, जुलाई में थोक महंगाई में नरमी व्यापक नहीं थी और यह पूरी तरह ईंधन एवं बिजली समूह के कारण आई। जून की तुलना में अन्य सभी समूहों में महंगाई बढ़ी है। उन्होंने कहा कि अगस्त माह के दौरान थोक मुद्रास्फीति में अधिक नरमी आने और इसके 9.5 प्रतिशत से नीचे रहने का अनुमान है। मई-जून 2026 में यह 9.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई थी। थोक महंगाई के आंकड़े इस सप्ताह की शुरुआत में जारी खुदरा महंगाई के आंकड़ों से अलग तस्वीर पेश करते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति जुलाई में बढ़कर 4.45 प्रतिशत हो गई, जो जून में 4.38 प्रतिशत थी। इसमें खाद्य कीमतों में वृद्धि की प्रमुख भूमिका रही।


