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जब ओशो को कॉलेज से निकाला गया, फिर प्रोफेसर की नौकरी छोड़ बन गए आध्यात्मिक गुरु

आचार्य रजनीश ओशा का जीवन विवादों और रहस्यों से भरा था। कॉलेज के दिनों में उनकी एक प्रोफेसर से इतनी बहस हो गई कि उन्हें कॉलेज से ही निकाल दिया गया था।

 जब ओशो को कॉलेज से निकाला गया, फिर प्रोफेसर की नौकरी छोड़ बन गए आध्यात्मिक गुरु
Ankit Ojhaलाइव हिंदुस्तान,नई दिल्लीSun, 10 Dec 2023 09:42 PM
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आचार्य रजनीश ओशो का जीवन रहस्यों और विवादों से भरा रहा है। एक साधारण परिवार में जन्मे रजनीश ने किस तरह ओशो बनकर एक साम्राज्य खड़ा कर लिया और फिर किस तरह उनका साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया, इसके पीछे दिलचस्प कहानी है। आचार्ज रजनीश के बचपन का नाम चंद्रमोहन जैन था और उनका जन्म मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में हुआ था। दर्शन शास्त्र में उनकी रुचि बचपन से ही थी। ओशो की किताबें और उनका दर्शन आज भी खूब पढ़ा और सुना जाता है।

जब कॉलेज से निकाले गए ओशो
वसंत जोशी ने ओशी की जीवनी लिखी है जिसका नाम 'द ल्यूमनस रेबेल लाइफ स्टोरी ऑफ अ मैवरिक मिस्टिक' है। इसमें उन्होंने बताया कि बचपन से ही ओशो खूब सवाल पूछा करते थे। वहीं जब ओशो जबलपुर के कॉलेज से बीए कर रहे थे तो उनकी दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के साथ बहस हो गई। दरअसल उनके सवालों से उनके प्रोफेसर भी तंग हो गए थे। इसके बाद प्रोफेसर ने कह दिया कि या तो वह कॉलेज छोड़ दें या फिर वह पढ़ाना ही छोड़ देंगे। बाद में कॉलेज के प्रिंसिपल ने ही उनसे कहा कि वह नहीं चाहते कि कॉलेज से सीनियर प्रोफेसर चले जाएं इसलिए वही कॉलेज छोड़ दें। ओशो ने उनकी बात मान ली लेकिन इसके बाद उनको ऐडमिशन मिलने में बड़ी दिक्कत हुई। अंत में एक कॉलेज में उनको ले लिया गया। 

ओशो इतना पढ़ाई करते थे कि उनके सिर में भयंकर दर्द होने लगा। बाद में ओशो रायपुर  की यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बन गए। तीन साल बाद जबलपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए। वह दर्शनशास्त्र को लेकर भाषण भी देने लगे। उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगे। तभी ओशो के मन में आध्यात्मिक गुरु बनने का विचार आया और वे उसी ओर बढ़ते चले गए। प्रोफेसर का पद छोड़ उन्होंने मुंबई में अपना आश्रम बना लिया। 

ओशो सेक्शुअल लिबरेशन की बात करतके थे। उनका जीवन विवादों से घिरा रहा। उनके अनुयायी देश-विदेश में फैलने लगे। हजारों की संख्या में लोग उनका प्रवचन सुनने आया करते थे। हालांकि उनके विचारों पर विवाद भी हो जाया करता था। ओशो पर प्रतिबंध लगाने की भी चर्चाएं चल रही थीं। बाद में ओशो ने पुणे में अपना आश्रम बनाया जहां बड़ी संख्या में विदेशी आने लगे। बताया जाता है कि ओशो के आश्रम में यौन स्वतंत्रता थी। कोई किसी के साथ भी संबंध बना सकता था। उन्होंने खुलेआम सेक्शुअल पार्टनर बदलने की वकालत की और अपने आश्रम में छूट दी। हालांकि इसका दुश्परिणा दिखा और आश्रम में संक्रामक बीमारियां बढ़ने लगीं। 

अमेरिका में जेल भी जाना पड़ा
विदेशी अनुयायियों की बढ़ती संख्या और महत्वाकांक्षा के लिए ओशो ने अमेरिका में आश्रम बनाने का सोचा। हालांकि वहीं से उनके बुरे दिन शुरू हो गए। उनपर प्रवासी नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा और फिर 17 दिन के लिए जेल भी जाना पड़ गया। बाद में वह फिर से भारत लौटे। 19जनवरी 1990 को पुणे में ही ओशो का निधन हो गया।
 

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