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सलाम: शिक्षक जिन्होंने बदहाल सरकारी स्कूलों को आदर्श बनाया

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उत्तराखंड में छात्रों का मोहभंग होने के कारण सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। शिक्षकों ने ठेके पर पढ़ाने वाले रखे हैं जो ठीक से नहीं पढ़ाते। इसके विपरीत अनेक ऐसे शिक्षक हैं, जिन्होंने कड़ी मेहनत के सहारे सरकारी स्कूलों की सूरत बदल दी है। आइए जानते हैं ऐसे कुछ शिक्षकों की कहानी जिन्होंने सात स्कूलों की तस्वीर बदल दी।

खुद हॉस्टल बनवाया, पत्नी बनाती थीं छात्रों का खाना
देहरादून। राजधानी के जूनियर हाईस्कूल देहरा ऐसा सरकारी स्कूल है, जो बगैर सरकारी मदद के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए आवासीय सुविधा देता है। इसका श्रेय प्रधानाध्यापक हुकुम सिंह उनियाल को जाता है। 2008 में जब उनियाल इस स्कूल में आए थे तब सिर्फ16 छात्र पढ़ते थे, उसमें भी पांच से सात छात्र ही स्कूल आते थे। फिर हुकुम सिंह इस स्कूल के साथ ही बच्चों के भविष्य को संवारने में जुट गए। हुकुम ने यहां हॉस्टल की व्यवस्था की। उनकी पत्नी हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के लिए खाना बनाती थी, जबकि बेटी बच्चों को स्कूल टाइम के अलावा पढ़ाती थी। धीरे-धीरे यह स्कूल मॉडल स्कूल बन गया। कभी स्कूल में टाट-पट्टी पर छात्र बैठते थे, अब यहां मेज-कुर्सी हैं। बिना सरकारी सहायता के कंप्यूटर की क्लास चलती हैं। प्रधानाध्यापक की मेहनत और जज्बे से इस आवासीय विद्यालय में अनाथ, गरीब 162 बच्चे इस वक्त पढ़ रहे हैं। 

दो साल में 23 से 175 हो गई छात्रों की संख्या
हल्द्वानी। कोटाबाग ब्लॉक का राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय, पतलिया प्रधानाध्यापिका दीपा जोशी के प्रयासों से किसी निजी स्कूल से कम नहीं है। प्रधानाध्यापिका ने व्यक्तिगत प्रयासों से करीब पांच लाख रुपये के कार्य कराये। इनके साझा प्रयासों से यहां पांच कक्ष बन चुके हैं।

खुद प्रोजेक्टर-एसी खरीदे ताकि बच्चे पढ़ने स्कूल आएं
जसपुर। राजकीय प्राथमिक विद्यालय, तालबपुर में शिक्षक अवनीश कुमार चौहान के अभिनव प्रयोगों से छात्र संख्या 17 से 132 तक पहुंचा दी। अवनीश ने शुरुआत में अपने पैसे से वीडियो प्रोजेक्टर, एलसीडी और एसी खरीदे। उनका मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल आएं। उन्होंने 35 जीबी डाटा जुटाया। बच्चों को प्रोजेक्टर पर दृश्य दिखाकर पढ़ाया। अपने स्तर से तैयार वर्कशीट से भी बच्चों को पढ़ाई के तरीके बताए। अवनीश बच्चों की सफलता-कमजोरियों के बारे में अभिभावकों को मोबाइल पर मैसेज भेजते हैं।

कमजोर छात्रों को छुट्टी के दिन भी पढ़ाते हैं शिक्षक
पिथौरागढ़। चार साल पहले कम छात्र संख्या होने से बंद होने की कगार पर आया गुरना का प्राथमिक विद्यालय आज आदर्श विद्यालयों में शुमार है।  शिक्षकों की कड़ी मेहनत से आज  यहां 122 बच्चे पढ़ रहे हैं। इस प्रगति को देखकर शासन ने 2016 में इसे आदर्श विद्यालय घोषित किया। प्रधानाध्यापक सुभाष चंद्र जोशी ने बताया कि पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए अवकाश के दिन भी अतिरिक्त कक्षाएं चलाई जाती हैं।

बच्चों को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना सिखाया
बागेश्वर। कपकोट के प्राथमिक विद्यालय को जब मॉडल स्कूल का दर्जा मिला तब यहां सिर्फ 44 बच्चे ही पढ़ते थे। प्रधानाध्यापक केडी शर्मा और उनके सहयोगियों की मेहनत से आज इस विद्यालय में 325 बच्चे पढ़ रहे हैं। तीन साल पहले यहां मात्र दो शिक्षक थे, अब 10 शिक्षक पढ़ा रहे हैं। यहां बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं। शिक्षक लगातार उन्हें सिखाने का प्रयास करते हैं। इस विद्यालय से अब तक 11 बच्चे सैनिक स्कूल घोड़ाखाल, 14 जवाहर नवोदय विद्यालय और 12 बच्चे राजीव गांधी नवोदय विद्यालय में चयनित हो चुके हैं।

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